"ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥"
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Tuesday, July 5, 2011

"माँ तारा":-(ममतामयी माँ सबको तारने वाली)

माँ तारा जब तुम्हें याद करता हूँ तो मन भर जाता है और शब्द निकल नहीं पाते क्या लिखूँ तारा माँ तुम्हारे बारे में।प्रेम की पराकाष्ठा हो तुम,परम प्रेममयी हो और सबको तारने वाली प्यारी माँ हो।वशिष्ठ के द्वारा तुम्हारी साधना करने पर भी जब तुम्हारी सिद्धि नहीं हो पाई तो तुम्ही को किलित करने लगे।तब तुमने आकाशवाणी कर बताया कि चीनाचार विधि से तुम्हारी साधना सफल हो पायेगी तब जाकर वे तारा की सिद्धि कर पाये और साधना स्थान रहा "तारापीठ की वीरभूमी" जहाँ पंचमुंडी आसन पर बैठकर वे साधना कर पाए।द्वापर युग में कृष्ण के आने पर तुम्हारी साधना के कीलन टुट गये और तुम्हारी साधना सबके लिए सुलभ हो पाया।तुम्हारे परम साधक,भक्त तारापीठ के वामाखेपा जी हुए जिन्होने बिना मंत्र,विधि के प्रेम और भक्ति से ही तुम्हें प्राप्त कर लिया।तुम अपने भक्तों का विशेष ख्याल रखती हो कारण तुम बहुत ममतामयी माँ हो।
-:प्रसंग:-
वामा,माँ तारा से झगड़ा करते फिर माँ को मनाते।कभी जब खुद रूठ जाते तो माँ अपने प्यारे बेटे को मनाती।ऐसा संबध है तारा माँ का अपने भक्तों से।एक बार की घटना है तारापीठ के मंदिर में मां का पूजा आरम्भ होने जा ही रहा था कि वामाखेपा मंदिर में पहुँच कर माँ का प्रसाद जो भोग के लिए रखा था खुद खाने लगे।इनके इस कृत्य को देख पंडित,पुजारी इन्हें मारने लगे,बहुत मारा उन्हें और उठाकर बाहर फेंक दिया और कहा कि फिर दिखाई मत देना मंदिर के आसपास।वामा रो रहे थे और बोल रहे थे कि "तुने ही मंदिर मे बुलाया माँ और इतना मार खाया मै।अरे भई तुम लोग मुझे इस तरह मत मारो,माँ ने मुझसे खाने को कहाँ था तभी मैं खा रहा हूँ।" इधर मार पे मार पड़ती रही,वो दर्द से चिल्लाते रहे।पागल मुर्ख कही के,अब देखते है कौन तुमको अब प्रसाद खाने को देता है,एक पुजारी कहता है।एक भक्त से रहा नहीं गया कि बेचारा बोल उठा क्यों मार रहे हो बेचारे को ब्राह्मण का लड़का है,छोड़ दो इसे।मारे नहीं तो क्या करें,इस पागल को अभी पुजा भी नहीं हुई है प्रसाद जुठा कर दिया है।यह शमशान में कुते,सियार के साथ बैठकर जुठन खाने वाला,इसे कह रहे हो क्यों मार रहे हो?ठीक कर रहे है!ये फिर मंदिर के सामने दिखाई दिया तो मार के हाथ पैर तोड़ देंगे।इधर वामाचरण आँखो के आँसू पोंछते पोंछते उठ कर दर्द से कराहते हुए श्मशान आ गये और पेड़ के नीचे लेट कर रोते रहे।नाटो की रानी सो रही थी।उन्होनें स्वप्न देखा कि तारापीठ मे माँ तारा मंदिर छोड़कर रोते रोते जा रही है।जैसे उनको बहुत दुःख हो,माँ के बदन,पीठ से खुन निकल रहा था।जैसे माँ को किसी ने बड़ी बेदर्दी से मारा हो।हाथ जोड़कर रानी खड़ी हो गई और कहने लगी,माँ किस अपराध की सजा दे रही हो मां,हमे क्यों छोड़कर जा रही हो मां।फिर मां ने कहा काफी युग युगान्तर से मैं यहां काफी अच्छी और सुख शान्ति में थी लेकिन अब नहीं हूँ,तुम्हारे मंदिर में मेरे प्रिय पुत्र वामाचरण को कई लोगों ने निर्दयी होकर मारा है।वो प्रहार सब मुझ पर पड़े हैं,वो चोट मुझे लगी है।काफी दर्द हो रहा है,इसी वजह से मै और यहाँ नहीं रहूँगी चली जाऊंगी।रानी बोली एक की सजा दूसरे को क्यों माँ?मुझे अपनी गलती सुधारने का मौका दो,ताकि जिसने ये पाप किया हैं उसे सजा मिले मां!पर तुम हमें क्षमा करो मां।ठीक है पुत्री!मेरे प्रसाद को मेरे पुत्र को खिला दो,कारण चार दिन से मेरा पुत्र भूखा है और मैं भी उपवास में हूँ।रानी पड़प उठी,अरे मां!ये क्या आप चार दिन से उपवास में हैं!हां!अगर पुत्र भुखा हो तो क्या मां खा सकती है।इसीलिए मै भी भुखी हूँ।फिर अचानक रानी की नींद टूट गई।इधर मां तारा अपने पुत्र बामा को मनाने लगी।बामा पीड़ा से कराह रहे थे।मां वामाचरण के पास खुद प्रसाद लेकर आई और वामा से कहने लगी,ले बेटा प्रसाद खा ले,कितने दिनों से तुमने कुछ खाया नहीं,देख कैसी हालत हो गई है,एकदम सुख गया हैं।मां की बात सुन वामा बोले नहीं नहीं मैं नहीं खाऊंगा और मै कभी तुम्हारे मंदिर में नहीं जाऊंगा।खुद मंदिर में बुलाकर मार खिलाती हो।नहीं बेटे!उनलोगों ने तुम्हें नहीं मारा है,मुझे मारा है,ये देखो मेरे बदन में भी दाग है।मुझे भी दर्द हो रहा है,मैं भी तुम्हारी तरह भूखी हूँ।इतना सुनते वामा बोले,माँ मेरी तु भी भुखी हैं क्यों नहीं खाया तो मां बोली बेटा तुने नहीं खाया तो मैं कैसे खा सकती हूँ?इधर रानी अपनी प्रजा के साथ मंदिर आई।मंदिर में रानी आते ही सबसे पहले उस पुजारी को निकाल कर नया पुजारी रखा,फिर वामा को खोजने लगी।ढूँढते हुए रानी श्मशान में आई ,वहाँ वामा को देख क्षमायाचना करने लगी तथा सपने की सारी बात बताई।उसी समय रानी के आदेश पर मंदिर की सारी जिम्मेवारी वामाचरण को सौंप दी और बोली पहले वामा बाबा को भोग लगेगा फिर मां को भोग लगेगा तथा मंदिर की पूजा वामा अपने हिसाब से करेगें।इसके बाद क्या मजाल,कौन क्या कहे,बामा जाकर मंदिर के आसन पर बैंठ गये।कोई आचार,विचार नहीं मां को देख वामा मुस्कुरा दिये,तुम तो अन्तर्यामी हो,तुम क्या खाओगी पहले मैं ही खाऊंगा,और खुद खाने लगे,ये देख वहाँ उपस्थित लोग आश्चर्य होकर देखने लगे।खाना खाने के बाद वामा ने शुरू किया मां का पूजन करना।दोनों हाथों में जवा फूल की माला लेकर जितनी भी इच्छा हुई उतनी गाली देना शुरू किया मां को और वामा के आँखों से आँसू भी गिरते रहे ।फूल से उस आँसू को पोछते हुए अन्जली देने के उद्देश्य से देवी की मूर्ति पर फूल फेंक दिया।मंत्र के नाम पर उन्होनें सिर्फ ये कहा ये लो फूल,ये लो बेलपत्र,सारे भक्तजन लोग देखे कि वामा के द्वारा फेंके फूल एक एक कर सब आपस में मिलकर माला का रूप ले लिया फिर माँ के गले मे पहुँच गई।ऐसी प्रेममयी है तारा माँ और उनके भक्त।बामा एक बार काशी से पैदल ही तारा पीठ चल पड़े,कारण पैसा भी नहीं था।उनके सामने जो रास्ता मिला उसी रास्ते से आगे बढते रहे,दिन भर चलते जहां रात होती वही किसी पेड़ के निचे सो जाते फिर प्रातःचलने लगते।लगातार कई दिन भूखे प्यासे चलते रहे,बाद में थक गये थे तथा कमजोरी के कारण चल भी नही पा रहे थे।थककर एक पेड़ के नीचे बैठ गये फिर एक यात्री से पूछा ये कौन सी जगह हैं भाई,पर इन्हें पागल समझ लोग मुँह फेर चले जाते,थके तो थे ही फिर हार कर बोलने लगे हे माँ तारा ये कौन सी जगह ले आई हो माँ।अचानक एक आवाज आई तुम कहाँ जाओगे।नारी की आवाज सुन रास्ते के दुसरी तरफ देखा काले कपड़े पहनी हुई एक कुमारी कन्या खड़ी है,काफी सुन्दर घने बालों वाली कन्या थी तथा पाँवो मे आलता लगा हुआं था।वामा आवाक होकर देखते ही रहे और आंखो में आंसू बहने लगे।काली मां का एक कन्या के रूप में वामा के नजदीक आकर पूछने लगी तुम रो क्यों रहे हो?लगता हैं रास्ता भूल गये हो?हां माँ!मैं रास्ता भूल गया हूँ।श्यामांगी अपने आंचल से वामाचरण के आँसू पोंछने लगी फिर प्यार से बोली रोते क्यों हो?कहां जाओगे तुम?मुझे नहीं पता मां!महामाया मुझे कहां ले आई हैं,लेकिन मैं तो जाऊंगा मां।श्यामांगी मन्द मन्द हंसने लगी,लगता हैं तुम्हें काफी भूख लगी है,रूको मै माँ के मंदिर से प्रसाद लेकर आती हूँ।ये कहकर ही श्यामांगी दौड़कर जंगल की तरफ गई और कुछ देर बाद एक पत्ते में प्रसाद ले आई।ये देखकर वामा मन ही मन हंस रहे थे,सोचे ये क्या कर रही है माँ,मुझे संसार की मोह से दूर कर खूद बेटे के मोह में आ रही हैं।ये लो खाओ,मां बोली।वामा प्रसाद लेकर श्यामांगी का मुंह देखते देखते प्रसाद खाते रहे।खाने के बाद काफी तृप्ति मिली वामाचरण को तब वे मां से बोले,मैं "तारा पीठ" किस रास्ते से जाऊंगा मां?तुम तारापीठ जाओगे?वो तो बहुत दूर है,फिर भी इस जंगल के अन्दर से एक रास्ता जाता है,क्या तुम जा सकोगे?अगर आप हमें रास्ता दिखायेंगी तो मैं क्यो नहीं जा सकुंगा माँ! ऐसा क्या कभी हो सकता है?और क्यों तरसा रही हो मां,कैसे जाना है,किस रास्ते जाना है,मेरा हाथ पकड़ा के ले चलो मां,जिस रास्ते जाना हैं।मां अपने बेटे की बात सुन मुस्कुरा कर बोली,तो चलो जल्दी,फिर वामा भी हंस कर उस कन्या का हाथ पकड़ चल दिए,क्षण भर में वामा तारापीठ में थे,कन्या अदृश्य हो गई।
-:रुप:-
तंत्र में कहा गया है "ततःशून्या परारूपा श्रीमहासुन्दरी कला।सुन्दरी राजराजेशी महाब्रह्माण्डनायिका॥महाशून्या ततस्तारा तद्वैगुण्यक्रमेण च।मुक्तौ संयोज्य सर्वं तं महासुन्दर्यनन्ततः॥" श्रीमहासुन्दरी को कला और श्रीतारा को शून्यरूप निर्देश किया है।अब द्रष्टव्य यह है कि शून्यरूप में ही सब देवता और देवी शक्तियां हैं।इस कारण अंतिम शून्य साधना करने के बाद शून्यरूप निर्विकार ब्रह्मरूप में लीन होकर मुक्ति साधन किया जाता है।जब कही आसरा नहीं मिलता तो लोग तारा माँ के शरण में जाते है,माँ सभी को अभयदान भक्ति प्रदान करती ही हैं।काली का एक रूप है तारा माँ,थोड़ा सा फर्क हैं।वशिष्ट तारा माँ की सिद्धि वेदोक्त विधि से करने लगे।पर यह संभव ही नहीं है कारण वेद के द्वारा तारा की साधना नहीं हो सकती।कारण ये शिव विद्या है।वेद तो नंदीश्वर के द्वारा शापित है,कारण दक्ष प्रजापति के यज्ञ में वेद अनुयायी ब्राह्मणों ने शिव निन्दा की तो कुपित होकर नंदी ने ब्राह्मणों को शापित कर दिया था।तारा के शिव अक्षोभ्य है,इन्हे तारा अपने मस्तक पर बिठाये रखती है।अक्षोभ्य यानि क्षोभ से मुक्त पूर्ण तृप्त कारण तारा प्रेयसी है,पूर्ण प्रेममयी सब कुछ प्रदान करने वाली सबसे बचाकर शिव को,पुत्र को,भक्त को अपने से अलग न करना तथा बहुत गलतियों को नजर अंदाज कर देना यही तारा रहस्य है।तारा कई रूपों में जानी जाती है।बौध हो या जैन धर्म सभी को तारा ही अपने लक्ष्य तक पहुँचाई है।जन्म जन्म के हमारे बंधन तारा अपने कैंची से काट देती है,यानि तार देती है।तारा धन देती है ,विद्या भी देती है,तथा सब कुछ प्रदान करती है यानि मूर्ख को भी ज्ञानी बना देती है।इनका एक रूप है नीलसरस्वती का ये कवित्व शक्ति प्रदात्री हैं।जो निश्चल हृद्वय के है,कपट से दूर वो पूर्ण प्रेम करना जानते हो उनके लिए अराध्य हैं तारा माँ।तारा में सीताराम छुपे हैं।
-:उपदेश:-
वामाक्षेपा के भक्तों के लिए कुछ प्यारे उपदेश "भगवान को देखने के लिए कैसी दृष्टि चाहिए,वैसी दृष्टि मिल सकती हैं साधना के द्वारा,विश्वास के द्वारा,फिर हम भगवान को देख सकते है।भगवान न पूरूष है न स्त्री,उनकी व्याख्या ही नहीं की जा सकती हैं।वो स्त्री और पूरूष का मिश्रण रूप है,इससे अधिक न समझो नहीं तो माथा खराब हो जायेगा।" भक्तों के आग्रह पर फिर बोले "परमब्रह्म निराकार है,ब्रह्म की आत्मा है आदिशक्ति सर्वभूता मातृरूप इसलिये शक्ति का नारी रूप है।वो नारी रूप में शक्ति प्रतीक बनकर घर घर विराजती है।ब्रह्म और शक्ति एक है ये ही दोनों मिलकर भगवान कहलाते है,इन दोनो का संबंध अटूट है।बच्चे सबसे पहले अपनी मां को पहचानते है,फिर मां ही पिता की पहचान करवाती है।इसलिये सभी को मां की उपासना करनी चाहिए।आदिशक्ति काली है,उनकी तीन सृष्टि हैं ब्रह्मा,विष्णु,महेश।असल में संसार एक भोग करने की जगह है,हर इंसान एक ही बार में त्यागी हो जाये यह असम्भव है।पहले भोग फिर त्याग।भोग नहीं करने से त्याग की शुद्धता नहीं मिलती हैं।त्याग ही निवृत्ति मार्ग का दरवाजा है,भोग के रास्ते से ही मन को तैयार करना पड़ता है।बहुत सा दिव्य वचन वामाक्षेपा जी ने दिया जो मनन करने लायक है।जीवन में निरसता क्यों?अगर परमसता को ही पाना है तो पहले बड़े उमंग से कर्म करना चाहिए।जीवन के आधार के लिए एक सच्चा मुकाम बनाकर कोई भी कार्य किया जा सकता है,तारा से सच्चे दिल से मांगने पर वह सब कुछ प्रदान कर देती हैं।बहुत सी बातें है,परन्तु मां तारा प्रेम की विरह वेदना से ही सिद्ध हो जाती है।जो भी भक्त को चाहिए वह प्रदान कर देती है,यह मां ही महामाया एवं ब्रह्म शक्ति है।दिल से तारा तारा पुकारने पर ही ये भक्त के सारे संकट हर लेती है।तारा माँ अपनी कृपा दृष्टि बनाये रखो,तुम्हारी जय हो माँ।
-:तारापीठ स्थल:-
झारखंड के बैधनाथ धाम के बगल में दुमका जिला से सटे पश्चिम बंगाल के वीरभूमी में स्थित द्वारका नदी के पास महाश्मशान में स्थित है तारा पीठ।पूर्वी रेलवे के रामपुर हाल्ट स्टेशन से चार मील दूरी पर स्थित है तारा पीठ।रामकृष्ण के समकालीन ही वामा क्षेपा, तारा पीठ के सिद्ध अघोरी परम भक्त थे।तारा पीठ ५२ पीठो के अन्तर्गत माना गया है।तारा पीठ तीन हैं।सती देवी के तीन नेत्रों की मणि बिन्दु बतीस योजन के अन्दर त्रिकोणाकार,तीन विभिन्न स्थानों पर गिरे थे।मिथिला के पूर्व दक्षिणी कोने में,भागीरथी के उत्तर दिशा में,त्रियुगी नदी के पूर्व दिशा में "सती" देवी के बाँये नेत्र की मणि गिरी,तो यह स्थान "नील सरस्वती" तारा पीठ के नाम से प्रसिद्ध हैं।बगुड़ा जिले के अन्तर्गत "करतोया नदी के पश्चिम में दाँईं मणि गिरी,तो यह स्थान "एक जटा तारा" और भवानी तारा पीठ के नाम से विख्यात हैं।बैधनाथ धाम के पूर्व दिशा में उत्तर वाहिनी,द्वारका नदी के पूर्वी तट पर महाश्मशान में श्वेत शिमूल के वृक्ष के मूल स्थान में "सती देवी" के ऊर्धव यानी तीसरे नेत्र का तारा गिरा,तो यही स्थान "शिलामयी चण्डी भगवती उग्र तारा" के नाम से प्रसिद्ध हैं,यही तारा पीठ के भक्त थे वामाक्षेपा।

Thursday, June 30, 2011

"माँ धूमावती":-(श्रद्धा और प्रेम की भूखी)

अध्यात्म में सब कुछ अनुभव की ही बात होती है,जिसे समय से पूर्व बता देना कदापि उचित नहीं होगा एक साधक के लिए।मैं क्यों लिखता हूँ ब्लाग पर।यह सोचकर कि शायद मेरे अनुभव से प्रेरित होकर किसी को स्वयं का अनुभव लेने का मन करे और वह किसी भी एक साधना का मार्ग अपनाकर आगे बढ चले।मैं शिवशक्ति को "ॐ शिव माँ" इस नाम से क्यों पुकारता हूँ क्योंकि इस नाम का महत्व मेरे साधना की अनुभूति से संबधित हैं।अमर प्रेम की अमर कहानी,शिवशक्ति के सनातन प्रेम का संबध,त्याग,दया और करूणा की लीला हैं।

दशमहाविद्या रुपों के अंतर्गत "माता धूमावती" युगों युगों तक परम प्रेम की विरह वेदना,त्याग और ममता से भरी भूखी माँ है।किस चीज की भूख है इन्हें?वास्तव में जीव को शिव तत्व से ज्ञान प्राप्त कराकर शिव में मिला देना और सभी कुछ प्रदान कर देना यही इनकी ममतामयी भूख हैं।भूखी माँ हैं इसलिए भक्त को अपने आचार के हिसाब से धूमावती माता को खूब ढेर सारा भोग देना चाहिये ताकि माँ की कृपा बनी रहे।इनकी साधना बिना योग्य गुरू के कभी भूल से भी नही करनी चाहिये।मोह का जो नाश कर दे वही धूमावती हैं।हमारे जीवन में भाँति भाँति के मोह हैं।प्रेमिका,पत्नि का मोह,पद प्रतिष्ठा का मोह,संतान,धन,पद का मोह यहाँ तक की अपने शरीर का मोह,अंहकार का मोह,पापकर्म का मोह।जीवन के हर क्षेत्र में हम मोह से ग्रसित है,कारण हमारे अंदर दैविक शक्ति के साथ आसुरी शक्ति भी विद्यमान है इस आसुरी शक्ति के मोह का यह नाश करती है तभी हम अध्यात्म के डगर पर श्रद्धा से निर्भिक होकर पैर बढा पाते है।शत्रु संहार और दारिद्रय नाश के साथ ही भक्तों की रक्षा करती हैं।

उत्पति कथाः-
 इनकी उत्पति की कथा कुछ इस प्रकार है।एक बार भगवान शिव के अंक में अवस्थित माँ पार्वती भूख से पिड़ित होकर शिव से कुछ भोजन प्रबंध करने को कहने लगी,तब शिव ने कहा देवी प्रतिक्षा किजिये,शीघ्र भोजन की व्यवस्था होगी।परन्तु बहुत समय बीत जाने पर भी भोजन की कोई व्यवस्था नहीं हो सकी तब स्वयं भगवती ने शिव को ही मुख में रखकर निगल लिया,उससे उनके शरीर से धुआं निकला और शिव जी अपने माया से बाहर आ गये।बाहर आकर शिव ने पार्वती से कहा,मैं एक पुरूष हूँ और तुम एक स्त्री हो,तुमने अपने पति को निगल लिया।अतः अब तुम विधवा हो गई हो इस कारण तुम सौभाग्यवती के श्रृंगार को छोड़कर वैधव्यवेष में रहो।तुम्हारा यह शरीर परा भगवती बगलामुखी पीताम्बरा के रूप में विद्यमान था,लेकिन अब तुम धूमावती महाविद्या के रूप में जगत में पूजित होकर संसार का कल्याण करते हुए विख्यात होगी।

रुप और नामः-
 यह देवी भयानक आकृति वाली होती हुई भी अपने भक्तों के लिये सदा तत्पर रहती हैं।इन्हें ज्येष्ठा तथा अलक्ष्मी भी कहा जाता हैं।जगत की अमांगल्यपूर्ण अवस्था की अधिष्ठात्री के रूप में ये देवी त्रिवर्णा,विरलदंता,चंचलाविधवा,मुक्तकेशी,शूर्पहस्ता,कलहप्रिया,काकध्वजिनी आदि विशेषणों से वर्णित हैं।

प्रसंगः-
 दतिया में माता धूमावती की प्रतिष्ठा हुई,कारण सन १९६२ ई. में चीन देश द्वारा अपने देश पर आक्रमण करने से देश में संकट की घड़ी पैदा हो गयी।देश की आजादी शैशवास्था में थी।वहाँ के नेता माओत्सेतुङ्ग और चाऊएनलाई ने भारत से मित्रता कर हमें धोखा दिया था़।सच्चे देशभक्त की भाँति "श्रीस्वामी प्रभु" का हृदय राष्ट्र पर आई विपति को देखकर द्रवित हो उठा।
प्रभु ने राष्ट्र को निर्लिप्त रखकर उस महानतम विपत्ति से किस प्रकार बचाया जाये,इसका स्मरण करते हुये माँ का गुणगान किया।श्रीस्वामी जी ने एक शास्त्री को बुलाकर कहा कि देश पर संकट हैं और यह दैवीय उपाय से ही टाला जा सकता हैं।बड़े बलिदानों के बाद हमारा देश स्वतंत्र हुआ हैं,परन्तु शत्रु आक्रमण करके देश को फिर से गुलाम बनाना चाहते हैं।इन शत्रुओं की बर्बरता हमारे आर्य धर्म के लिए अत्यन्त घातक सिद्ध होगी।देश में न राम रहेगा न दास।देश में नास्तिकता घर कर जाएगी।शास्त्री ने जिज्ञासा की,क्या इसका कोई उपाय किया जा सकता है?प्रभो! श्री स्वामी जी ने उत्तर दिया,साधु शस्त्र लेकर तो लड़ नहीं सकते,पर जगदम्बा का प्रार्थना रूप अनुष्ठान अवश्य करा सकते हैं।इसके लिए सौ कर्मकाण्डी पण्डितों की आवश्यकता होगी,जो नित्य दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हो अपने दैनिक जीवन में।जो अपने भजन का विक्रय न करते हों,जो शक्ति मन्त्र से दीक्षित हो।इसके लिए धन भी चाहिए।फिर चीन तो क्या ब्रह्माण्ड भी बदला जा सकता है।तुम कार्यक्रम की तैयारी करो।शास्त्री ने घर आकर विचार किया कि इसमें तो लाखों रूपये खर्च होंगे,धन कहाँ से आएगा? दूसरे दिन श्री महराज ने पूछा"क्या कार्यक्रम बना लिया हैं"?नहीं महराज जी अभी बना रहा हूँ।कहकर बात टाल दी।श्रीस्वामी जी ने कहा शीघ्रता से बनाओ।तीसरे दिन भक्त रामदास बाबा ने देखा महाराज जी व्यग्रता और बैचेनी से शिव मन्दिर के पास टहल रहे हैं।डरते डरते पास जाकर उन्होंने देखा कि महाराज जी का शरीर काँप रहा है नेत्रों में लाली छायी हैं,और मुँह से सिंह जैसी गर्जना निकल रही हैं।उन्होंने देखा कि श्री महाराज जी ने दाहिने हाथ की मुट्ठी को बाँधकर अपने सीने पर बड़े जोर से मारा जिससे बड़े धमाके की आवाज हुई।फिर सिंह गर्जनाकर बोले चीन अवश्य वापस जाएगा,चाहे मुझे इसके लिए अपना सर्वस्व ही क्यों न लगाना पड़े।इस देश का अन्न खाया हैं।रामदास बाबा से कहकर उस शास्त्री को बुलवा कर पूछा क्या तुमने कार्यक्रम बना लिया हैं?शास्त्री ने कहा महाराज बना रहा हूँ।यह सुनते ही महाराज जी ने कहा "तुम बड़े सुस्त हो,देश पर संकट आया है और तुम काम में देर कर रहे हो।"शास्त्री मन ही मन सोच रहे थे,चलो कार्यक्रम तो बना देते हैं होना जाना तो कुछ है नहीं क्योंकि खर्च का प्रबन्ध कहाँ से होगा।अभी यह बात सोच ही रहे थे कि देखा दवाईयाँ बनाने वाली कम्पनी "बैधनाथ भवन के मालिक पण्डित रामनारायण वैध" स्वामी दर्शन हेतु बड़ी व्यग्रता से अन्दर आ रहे हैं।वैध जी ने आते ही प्रणाम करके कहा प्रभो देश पर महान संकट आया है,क्या किया जाए?श्री स्वामी जी ने उत्तर दिया "उपाय तो है लेकिन धन की आवश्यकता पड़ेगी।" वैधजी ने शीघ्र उत्तर दिया मेरी अपनी सम्पूर्ण सम्पति जो आपकी कृपा से ही मुझे प्राप्त हुई है,राष्ट को समर्पित हैं। यह सुनकर शास्त्री सोचने लगे मुझे कितने दिन प्रभु के पास आते हुए हो गये लेकिन मैंने इन्हें पहचाना नहीं और बात को टालता रहा,वे लज्जित होकर शीघ्र ही कार्यक्रम बनाने में जुट गए।वैद्यजी ने धन और पण्डित सबका प्रबन्ध किया,अनुष्ठान प्रारम्भ हो गया।अनुष्ठान के मध्य में ही श्री सदाशिव स्वामी अनुष्ठान की सफलता की घोषणा कर दी।इस अनुष्ठान में त्रैलोक्य स्तम्भिनी भगवती बगलामुखी एवं भगवती धूमावती का आह्वान किया गया था।अनुष्ठान के दौरान जबकि अनुष्ठान प्रारंभ हुए करीब एक सप्ताह हुआ था श्री प्रभु ने अपने रात्री के एक स्वप्न का साधकजनों को विस्तृत विवरण दिया "रात्री को हमने स्वप्न में क्या देखा कि हम घूमते हुए उद्यान में पहुँचे जहाँ एक छोटा सा जलाशय भी है।समीप जाकर क्या देखते हैं,जलाशय के किनारे एक काले वर्ण की बुढिया बैठी है और उसके पास एक बालक भी खड़ा है।पास आने पर बुढिया अंग्रेजी में बोली "आई डोन्ट नो यू"।यह वचन सुनकर मैंने हाथ जोड़कर उसका अभिवादन किया,इतने में हमारी नींद टूट गई तब से हम यही सोच रहे हैं कि यह तो धूमावती देवी थी।हम हमेशा इनका स्मरण भी करते हैं फिर भी इन्होने यह क्यों कहा "आई डोन्ट नो यू" श्री महाराज के श्री मुख से यह शब्द बड़े ही प्यारे मालुम हुए।श्री स्वामी ने आगे कहा "मालुम होता है कि इस अनुष्ठान में हमने इनका योगदान नहीं लिया है शायद वे इसलिए असंतुष्ट हैं,हमें उनका भी योगदान इस अनुष्ठान में लेना होगा।फिर वैसा ही किया गया।भक्त गोपालदास जो वहाँ बैठे थे,श्री महाराज जी से आज्ञा माँगकर भगवती धूमावती के संस्मरण सुनाने लगे जो अनुष्ठान के समय में हुए थे।श्री प्रभु ने उनको आदेश दिया था कि भगवती धूमावती के चित्र से,जो दीपक के सामने स्थित है,यदि कोई अनुभव या मूक भाषा सुनाई दे तो वह तुरन्त आपको सुनाया जाए।ग्यारहवें दिन अर्धरात्री को आश्रम में निर्मित अखाड़े के पास एक भयानक तांत्रिक पशु की ध्वनि हुई।तुरन्त जाकर भक्तों द्वारा स्वामी जी को बताया गया और उन्होनें प्रसन्न मुद्रा में कहा आंरभ शुभ है जाओ अपना काम करो।पन्द्रहवें दिन चित्र से आदेश मिला मैं भूखी हूँ।यह भी प्रभु को बतलाया,तो उन्होनें पूरा विवरण सुनकर कहा,वह तो हमेशा भूखी रहती हैं,उनको बली देना अत्यन्त कठिन है।चावल,साबुत,उड़द,शुद्ध घी,गुड़ और दही सम्मिश्रण कर भोजन कराओ"।दूसरे दिन पुनःचित्र से संकेत मिला कि "भोजन पर्याप्त नहीं है,तब फिर श्री स्वामी की आज्ञा से घी चुपड़ी चार रोटी और बढा दी गई।अगली रात पुनः चित्र से संकेत मिला कि अभी जप कम हो रहा है,पाँच माला और बढाओ,तब उन्होनें पाँच माला का जप और बढाने का आदेश दिया।इक्कीसवें दिन जप करते हुए गोपालदास अर्धनिद्रित हो गए तभी भगवती धूमावती ने उनका हाथ पकड़ कर कहा,मेरे साथ मोटर में बैठकर चीन चलो।गोपालदास ने उत्तर में कहा कि,मैं अनुष्ठान कर रहा हूँ,अनुष्ठान छोड़कर मैं कैसे जा सकता हूँ,कृपा करके आप अकेली चली जाएँ।माता धूमावती कार में बैठ गयी,मोटर चलने की आवाज आयी और वे अदृश्य हो गयी।यह बात श्री प्रभु से कही,तो उन्होनें कहा,तुमने गलती की तुम्हें माँ के साथ जाना था,खैर!अब हमको जाना पड़ेगा।उसके दूसरी रात्री को जपकर्ताओं ने जप करते समय अर्धोन्मीलित नेत्रों से देखा कि भगवती धूमामाई चीनी सेना पर प्रहार कर रही है,परिणाम स्वरूप चीनी सेना में भगदड़ सी मच रही है और वह अपने देश को वापस जा रही हैं।बाद में पूर्णाहुति से पूर्व ही चीन ने युद्ध विराम की घोषणा कर दी।
 इन्हीं दिनों देवरिया के एक एक वकील साहब ने श्री स्वामी की आज्ञा से सन् १९६२ ई. में भगवती धूमावती के लिए एक छोटा सा मंदिर निर्मित करा दिया,क्योंकि माता धूमावती ने श्रीस्वामी से कहा "मैंने तुम्हारा काम किया हैं अब तुम भी मेरा काम करो" मेरा भी आश्रम में एक मंदिर बनवाओं,तब श्रीस्वामी ने माता धूमावती की प्रतिष्ठा कराकर भक्तों के लिए उनके दर्शन सुलभ बना दिया।श्रीस्वामी जी की एक शिष्या श्रीमती रेणु शर्मा नागपुर से गुरूदेव से मिलने आई,आकर प्रणाम कर बैठी ही थी कि एक कृशकाय वृद्धा श्वेत वस्त्र पहने और ललाट तक ओढनी ओढकर वहाँ आई।उसने आते ही स्वामी जी से प्रसाद देने के लिए निवेदन किया,प्रभु ने उस वृद्धा को प्रसाद दिया।प्रसाद लेकर वह मुड़कर वापस जाने लगी।वह कुछ ही कदम चली होगी कि श्री मुख से निकला "भगवती धूमावती प्रतिदिन एक बार यहाँ से प्रसाद लेने आती हैं"।उसी समय रेणु शर्मा ने पूछा,हे सर्वसाक्षी!अभी आप कह रहे थे कि धूमावती माता प्रसाद लेने आती हैं,अगर उनके आने का समय आप बता दें तो मैं उस समय आकर उनका दर्शन करूँ।आपने कहा उनके आने का कोई समय नहीं है,तभी रेणुशर्मा के मस्तिष्क में बिजली सी कौंधी कि यह बुढिया माता धूमावती तो नही थी और शीघ्रता से पलटकर पिछे की ओर देखा तो कोई भी नहीं था।रेणु शर्मा ने श्री स्वामी से पूछा कही यह बुढिया धूमावती माता तो नहीं थी,तो उन्होनें बहुत रहस्यमय वाणी में कहा ,हो सकता है,वो ही हो।

दतिया में नित्य कुछ समय के लिए भगवती धूमावती का दर्शन होता हैं,वैसे शनिवार को विशेष दर्शन होता है, भक्त लोग सफेद पुष्प के साथ नमकीन,मिक्चर के साथ,पुड़ी,पकौड़ा प्रसाद अर्पण कर माता की कृपा प्राप्त करते है।माता धूमावती विधवा रूप में है,इसलिये सौभाग्यवती स्त्री को दर्शन करने का निषेध हैं।महाविद्या में धूमावती का विशिष्ट महत्व है।जीवन में रोग,पीड़ा सभी को मर्माहत कर देता है।जीवन का शांत भाव से मनन किया जाय तो पता चलता है कि अंहकार,एवं मोह के कारण हम सत्य से दूर हो चूके है।"क्या चाहिए हमे"? शिव की उपासना करने से गुरू प्राप्त होते है तभी जीवन का रहस्य समझ में आता है।श्री करपात्री जी को मैसुर के राजा ने गंगा किनारे का अपना सैकड़ों एकड़ भूमि,महल के साथ दान कर दिया तब श्री करपात्री जी ने द्वारकापीठ के शंकराचार्य को बुलाकर उन्हें सारी संपति दे दी,यही संत,साधक का लक्षण है।श्रीसाई बाबा शिरडी वाले जीवन भर भक्तों के लिए सभी कुछ प्रदान किये,स्वयं के कुर्ता में पैंबद लगा रहा और उनका नाम बेचकर दुसरे ने अरबों कमा डाला।कौन सच्चा संत है यह तो हमे सोचना चाहिए।
 गुरू गोरखनाथ,अवधूत दतात्रेय,श्रीस्वामी,श्रीरामकृष्ण परमहंस,श्रीसाईबाबा,स्वामी समर्थ,तैलंग स्वामी,वामाखेपा,अघोरी कीनाराम ,आचार्य श्रीरामशर्मा ये सभी परम संत,साधक,तथा स्वयं परमतत्व ही है।आज नकली साधक,संत से बाजार पटा है,सभी सिद्ध बनते है परन्तु ये किसी काम के नही है कारण माता धूमावती ने सभी को मोह से ग्रसित कर दिया है।साधक को ज्यादा समय मिलता ही कहाँ जो शिविर लगाए,दीक्षा दे,ज्यादा भीड़ जुटाने वाले का लक्ष्य एक ही है कि मेरे भक्त ज्यादा लोग हो जाए और धनार्जन हो।दशमहाविद्या ब्रह्मविद्या है और इसके अधिपति शिव हैं।बिना शिव कृपा किसी को महाविद्या की साधना फलीभूत नहीं होती।मेरा मन जब तक कृपण है,गणितीय बुद्धि है तब तक साधना के क्षेत्र में प्रगति संभव नहीं हैं।ऐसी कोई समस्या नहीं है,जो धूमावती माता दूर न करे।भूख लगी हो उस समय शरीर का क्या हाल होता है,इसे कोई भी समझता है।शिव ने लीला की और परम प्रेमी पुरूष शिव को ही उदरस्थ कर लिया यह जीव के प्रति शिव का प्रेम ही है, तभी तो करूणा से भरी उग्र शक्ति धूमावती को हम बार बार नमस्कार करते है।माता हम सच्चे मन से आपको पकौड़ा,पकवान का भोग देकर आपकी स्तुति कर रहे है,हमारे,संतान,परिवार के साथ ही हमारे राष्ट की भी रक्षा करे,तभी तो दतिया में आप विराजमान है।आपकी जय हो,जय हो,जय हो।श्रीस्वामी सहित माता धूमावती को बार बार नमस्कार हैं।

Monday, February 28, 2011

कमला

कांती और शांति देती है,वही कमला है।ये महालक्ष्मी का रुप है,श्री विष्णु शक्ति है।ये शिव शाक्त की विशेष शक्ति है।जीव हमेशा अशांत रहता है,कारण कुछ न कुछ हो,उस अशांति से साधक को विशेष धन,देकर,धर्म,कर्म में रुचि बढ़ाकर,विशेष पुण्य की ओर ले जाती है।धन के बिना कोई साधना कठिन है।ये जो ऐश्वर्य सुख देती है,वह सुकर्म के द्वारा प्राप्त होता है।शारीरीक पुष्टता,तेज,ओज,चमक के साथ,परम शांति प्रदान करती है।
चिंता न करो,अशांत इसलिए थे कि,मोह,अहंकार,माया,पद,ईर्ष्या से तुम एकाकार होते रहे।अब सारे बंधन काट लिए हो,अब आराम से समाधि लेते रहो।लोगों में शांति प्रदान करो,दूसरों को मदद करो,जीव का सहायक बनो।यही तुम्हें परम शांत स्वरुप का बोध करायेगा।तुम शांत हो,अचल हो,यही स्वभाव,वही स्वरुप प्रकट करा कर दिव्य दर्शन की ओर ले जाती है।

मांतगी

मद का जो नाश करती हैं,वही मांतगी है।सारे अच्छाई को ये मद नाश करता हैं।पद ,हो या बल आप बहुत प्रसिद्ध है,धनी है या भक्त अगर इसमें अहम आ जाये तो यह मद ही हुआ। यह मद जीव को बांधता हैं,तो उस बंधन से मुक्त करती है यह मांतगी।
कितने पुण्य प्रभाव के बाद हमे मानव का जीवन मिला हैं।इस अमूल्य जीवन को हमे ऐसा करना चाहिए की मद का नशा इसे छू न पाये इस मद से बचाती है मांतगी।मांतगी की साधना करने इस मद के नाश के साथ हमारी वाणी मधुर हो जाती हैं।ये संगीत की देवी है,मोहक आवाज,सुर का लय इनकी कृपा से प्राप्त हो जाता हैं।बिगड़े स्वर ठीक हो जाता है,वही बन्द स्वर भी खुल जाता है,जिवन में प्रेम का उदय होता है।हमारे सारे मदों का नाश कर ये हमें आगे बढ़ा देती हैं।

Sunday, February 27, 2011

श्री बगलामुखी (पीताम्बरा माई)

विश्व की रक्षा करने वाली हैं,साथ जीव की जो रक्षा करती हैं,वही बगलामुखी हैं।स्तम्भन शक्ति के साथ ये त्रिशक्ति भी हैं।अभाव को दूर कर,शत्रु से अपने भक्त की हमेशा जो रक्षा करती हैं।दुष्ट जन,ग्रह,भूत पिशाच सभी को ये तत्क्षण रोक देती हैं।आकाश को जो पी जाती हैं,ये विष्णु द्वारा उपासिता श्री महा त्रिपुर सुन्दरी हैं। 
ये पीत वस्त्र वाली,अमृत के सागर मे दिव्य रत्न जड़ित सिंहासन पर विराजमान हैं।ये शिव मृत्युञ्जय की शक्ति हैं।ये अपने भक्तों   के कष्ट पहुँचाने वाले को बाँध देती हैं,रोक देती है।ये उग्र शक्ति के साथ,बहुत भक्त वत्सला भी हैं,परम करूणा के साथ भक्त के प्रत्यक्ष या गुप्त शत्रु को रोक देती हैं।ये वैष्णवी शक्ति हैं,ये शीघ्र प्रभाव दिखाती है,इस लिए इन्हें सिद्ध विद्या भी कहा जाता हैं।गुरू,शिव जब कृपा करते है तो ही इनकी साधना करने का सौभाग्य प्राप्त हो पाता हैं।वाम,दक्षिण दोनो आचार से इनकी पूजा होती हैं परन्तु दक्षिण मार्ग से इनकी पूजा शीघ्र फलीभूत होती हैं।ये काली,श्यामा के ही सुन्दरी,ललिता की एक दिव्य मूर्ति हैं।इनकी उपासना में अनुशासन,शुद्धता,के साथ गुरू की कृपा ही सर्वोपरि हैं।इनकी उपासना से साधक त्रिकालदर्शी होकर भोग के साथ मोक्ष भी प्राप्त कर लेता है,इनके कई मंत्र के जप के बाद मूल मंत्र का जप किया जाता है,कवच,न्यास,स्तोत्र पाठ के साथ अर्चन भी किया जाता हैं,इनका ३६ अक्षर मंत्र ही मूल मंत्र कहलाता हैं।इनकी साधना के अंग पूजा में प्रथम गुरू,गणेश,गायत्री,शिव,वटुक के साथ विडालिका यक्षिणी,योगिनी का पूजा अनिवार्य माना जाता हैं।ये विश्व की वह शक्ति हैं,जिनके कृपा से,चराचर जगत स्थिर रहता हैं।
ये ब्रह्म विद्या है इनकी साधना में शुद्धता के साथ जप,ध्यान के साथ गुरू कृपा मुख्य हैं।इनके जप से कुन्डलिनी शक्ति जाग्रत हो जाती है,इनके साधक कोई भी आसुरी शक्ति एक साथ मिलकर भी परास्त नहीं कर सकता,ये अपने भक्तों की सदा रक्षा करती है।विश्व की सारी शक्ति मिलकर भी इनकी बराबरी नहीं कर सकते हैं।  कई जन्म के पुण्य प्रभाव से इनकी साधना करने का सौभाग्य प्राप्त होता हैं।पुस्तक से देखकर या कही से सुनकर इनका मंत्र जप करने से कभी कभी जीवन मे उपद्रव शुरू हो जाता है।इसलिए बिना गूरू कृपा के इनकी साधना न करें।भारत में इनके मंदिर तो कितने है,परन्तु इनका विशेष साधना पीठ श्री पीताम्बरा पीठ,दतिया मध्य प्रदेश हैं।ये शुद्ध विद्या है,इनकी महिमा जगत में विख्यात हैं।इनकी कृपा से चराचर जगत वश में रहता है,इनकी साधना करने से ये अपने भक्त को सभी प्रकार से देखभाल करती है।ये परम दयामयी तथा करूणा रखती है।