"ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥"
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Saturday, August 13, 2011

"श्री राम".....(जगत के पालनहार)

श्री रामचरित मानस का पाठ सभी कामनाओं की पूर्ति के साथ ही संकट एवं रोग निवारण और आयुवर्धक भी हैं।कम पढ़ा लिखा व्यक्ति भी इसका लाभ ले सके इसीलिए गोस्वामी तुलसीदास जी का अवतरण हुआ था।वैसे तो मानस का प्रत्येक मंत्र फलदायी है,परन्तु कुछ अनुभूत प्रयोग दे रहा हूँ।
-:मेरे अनुभव:-
कुछ वर्ष पहले की बात है मेरे रिश्तेदारी की एक स्त्री को पैर के असाध्य रोग ने अपाहिज सा बना दिया।कईयों वैद्य,डाक्टर से उपचार कराने के बाद भी कोई लाभ नहीं मिला उल्टा रोग बढता गया।रोगी स्त्री का दर्द ऐसा था कि वह बार बार अपने पति से कहती थी कि मुझे जहर दे दिजिए कारण दर्द असहनीय था।पुरा परिवार शोक मे था कारण जाँच में डाक्टर के कुछ आता ही नहीं था।मेरे पास यह सूचना दी गई तब उसी रात रोगी स्त्री ने स्वप्न में श्री सिताराम जी का दर्शन किया मैं समझ गया और मैंने श्रीरामचरित मानस का सम्पुट नवाहन परायण का पाठ करवाने का सलाह दिया।
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गुरू,गणेश पूजन कर तुलसी बाबा सहित हनुमान जी का पूजन कर श्री सीताराम जी सपरिवार सहित पंचोपचार पूजन कर विशेष मंत्र से संपुट कर श्रीरामचरित मानस शुरू किया गया।रोगी को मूल मंत्र बताया गया तथा रोगी स्त्री को एक आसन पर बैठा दिया गया।पाठ शुरू हुआ तथा पाठ के समाप्ति पर आरती कर प्रसाद का फल,चरणामृत,तुलसीदल रोगी स्त्री को दिया गया और अंत में संपुट मंत्र से मार्जन किया गया।प्रथम दिन से ही थोड़ा दर्द कम होने लगा परन्तु नौंवे दिन तक दर्द यथावत बना रहा।नौवे दिन पाठ समाप्ति पर प्रत्येक काण्ड के प्रथम,अंतिम दोहा,चौपाई से हवन हुआ।मूल मंत्र से तीन माला हवन कराया गया जो रोगी स्त्री के हाथ से हुआ।हवन समाप्ति पर जैसे अद्भुत चमत्कार सा हो गया।रोगी स्त्री स्वयं उठकर चलने लगी,खुशी का ठिकाना नहीं,दौड़ती,रोती,खुशी के मारे भाव विभोर हो गई।रोग का नामोनिशान नहीं।इस घटना को आज दस वर्ष हो गएँ वह स्त्री आज तक स्वस्थ हैं।दुसरी घटना यह है कि जब मेरी माँ के बारे में डाक्टर ने कह दिया कि अब ये तीन चार दिन से ज्यादा नहीं रह सकती।माँ की इच्छा थी,कि मेरी बहन जो बहुत दूर थी उन्हें आने का टिकट नहीं मिलने के कारण विलम्ब हो गया मैंने मंत्र का जप करवाया जिसका प्रभाव हुआ कि जब बहन आ गई माँ ने देख लिया तब जाकर उनकी मृत्यु हुई।तीसरा अनुभव उस वक्त का है जब मेरी माँ की मृत्यु के बाद बारिश छुटने का नाम नहीं ले रहा था खैर उसी बारिश में हमलोग सारी व्यस्था किये और जब नदी किनारे शमसान भूमी पर पहूँचे वहाँ चिता सजाया गया लेकिन बारिश रूकने का नाम नहीं ले रहा था,अब क्या किया जाय घण्टों हो गये,सारे लोग भिगने के डर से गाड़ी मे बैठे थे तब जाकर मैंने मानसिक रुप से श्रीराम जी का स्मरण कर कहा "हे करूणानिधान राम लोग कहते  एक मंत्र का जप शुरू किया,मुश्किल से पाँच मीनट ही हुआ होगा कि आकाश में तीन बार भंयकर गर्जना हुई और बारिश बन्द हो गयी लेकिन एक आश्चर्य ये था कि बस उस क्षेत्र में वहाँ बारिश रूक गया था लेकिन २०० मीटर की दूरी पर बारिश होता रहा खैर हमलोग अग्नि संस्कार कर वापस आए तब तक वहाँ एक बूंद बारिश नहीं हुई।ऐसी ही बहुत सी राम कृपा की मनोहारी अनुभव है एक बार मुझसे ईष्या वश एक दुष्ट तांत्रिक ने मुझपर भीषण प्रयोग कर दिया,यह बात आज से २२,२३ वर्ष पहले की हैं,उस समय मेरा साधना का समय था तभी हनुमान जी ने आगाह किया,कुछ व्यस्था हो तब तक मुझपर प्रयोग आ गया लेकिन उसको हनुमान जी रोके रहे मैं थोड़ा अर्धविक्षिप्त सा हो गया था कि एक रात परम संत श्री देवराहा बाबा ने प्रकट होकर मुझे सूक्ष्म शरीर के द्वारा उस तांत्रिक के पास ले जाकर उसे दिखाया,मुझे तो विश्वास नहीं हुआ कारण वो मेरे बहुत शुभचिन्तक व्यक्ति थे,उस घटना के बाद मैंने श्री राम मंत्र के साथ हनुमान जी का तांत्रोक विशेष अनुष्ठान किया तब जाकर उस प्रयोग से मुक्त हो पाया था।मैं शूरू से शाक्त रहा हूँ परन्तु माता के सान्निध्य में जितने अनुभव हुये है उससे जीवन में बहुत कुछ समझने का चिंतन हुआ।सभी का महत्व है कभी कभी कोई साधक अपने ईष्ट के अलावा बाकी देवी,देवता को कुछ नहीं समझता जिस कारण उन्हें विशेष लाभ नहीं मिल पाता।हिन्दू के सनातन धर्म में पंचदेवता का बड़ा महत्व है,इनमें शिव,शैव धर्म,शक्ति,शाक्त धर्म,विष्णु,वैष्णव धर्म,गणेश,गाणपत्य धर्म,सूर्य,सौर धर्म इन पांचो का बड़ा महत्व रहा है,जो इष्ट होते है वह प्रधान तथा बाकी साथ पूज्यनीय हैं।
-:श्री रामचरित मानस का महत्व और मंत्र प्रयोग:-
श्रीराम तथा रामचरित मानस में क्या नहीं हैं कोई श्रद्धा से करे तो सब कुछ प्राप्त होता हैं।राम बिना सब कुछ सुना सुना भक्त किसी का हो जीवन में राम को आना पड़ता है,कारण हमारे अंदर आसुरी शक्ती भी प्रबल है उस पर विजय वास्ते तथा बाहर जगत में भीषण संकट,अवरोध है इस लिये श्रीराम को पुकारना पड़ता है और भक्त के एक बार पुकारने पर राम कृपालु होकर सहायता करते हैं।जो जगत में रम रहा है वही राम नाना रूप धारण कर हमारा कल्याण करते है।सीताराम में तारा है,वही शिव में विष्णु बसे है, दुर्गा में राम हैं घट घट में राम ही राम वही हनुमान जी के ह्रद्वय में सीताराम विराज रहे हैं।राम का चरित्र जीवन को सुन्दर बनाने में सहायक है,वही इसे आम आदमी के लिए लाभप्रद बनाने के लिए ही तुलसी बाबा को आना पड़ा,।राम मर्यादा पुरषोत्तम है वही कृष्ण प्रेम पुरषोत्तम है राम रक्षक है,दाता है,वही कृष्ण मित्र है,प्रेममय है परन्तु दोनों एक ही है।जब भी मैंने श्रीराम को पुकारा वो आए और मुझे संकट से उबारा,ऐसा मैंने अनुभव किया है।सीता उनकी शक्ती है यही मूल प्रकृति जगदम्बा हैं।शिव को भी हनुमान के रूप में जाना पड़ा इसलिए प्रथम राम कथा शिव के द्वारा जग में आया है।रावण के युद्ध के बाद श्रीराम को सहस्त्र रावण से युद्ध में जाना पड़ा वहाँ सहस्त्र रावण के बाण से राम मुर्छित हो गये तब माँ सीता को काली रूप धारण कर सहस्त्र रावण को समाप्त करना पड़ा।दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय के रात्री सूक्त में विष्णु के कान के मैल से उत्पन्न मधु,कैटभ के प्रकट होने के समय बह्मा जी के द्वारा भगवान विष्णु की योग निद्रा महाकाली की स्तुति करने पर ही काली के आशिर्वाद ही विष्णु जाग युद्ध किये,यही श्री राम है।राम परम करूणामय है तभी तो कोई जाये उनके पास परन्तु कपट को त्याग कर भक्ति भाव से उसको वे गले लगा लेते है।श्रीराम ऐसे भक्त वत्सल है प्रभु।सुन्दर काण्ड में आया है "मोहि कपट छल छिद्र न भावा" इस लिए श्रीराम राजा है,वीर है,सब को बांटते है।माँ जगदम्बा थी,हनुमान थे,शिव जी थे लेकिन राम के बिना चैन नहीं,शाति नहीं तभी श्री राम पधार गये शिव,माँ मेरी ओर देख मुस्कुरा दिए और हनुमान जी मुझे साथ ले झुमने लगे।हे राम क्या तु मेरी श्यामा माँ हो या शिव हो,तुझे देख कर ही गहन शांति व्याप्त हो रही है।उपरोक्त घटनाओं में जो मंत्र प्रयोग हुआ वह दे रहा हूँ।
१.मंत्रः- "त्रिविध दोष दुःख दारिद दावन।कलि कुचालि कलि कलुष नसावन॥"
२.मंत्रः- "दैहिक दैविक भौतिक तापा।राम राज नहिं काहुहिं व्यापा॥"
३.मंत्रः- "आपदाम पहर्तारं दातारं सर्व सम्पदाम्।लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्॥"

Thursday, July 28, 2011

"पार्थिव में बसे शिव कल्याणकारी"

शिव सनातन देव हैं।दुनियां में जितने भी धर्म है वे किसी न किसी रूप या नाम से शिव की ही अराधना करते है।ये कही गुरू रूप में पूज्य है तो कही निर्गुण,निराकार रूप में।शिव बस एक ही हैं पर लीला वश कइ रूपों में प्रकट होकर जगत का कल्याण करते हैं।शक्ति इनकी क्रिया शक्ति है।सृष्टि में जब कुछ नहीं था तब सृजन हेतु शिव की शक्ति को साकार रूप धारण करना पड़ा और शिव भी साकार रूप में आ पाये इसलिए ये दोनों एक ही हैं।भेद लीला वश होता है।और इसका कारण तो ये ही जानते हैं क्योकिं इनके रहस्य को कोई भी जान नहीं सकता और जो इनकी कृपा से कुछ जान गये उन्होनें कुछ कहा ही नहीं,सभी मौन रह गए।शिव भोले औघड़दानी है इसलिए दाता है सबको कुछ न कुछ देते है,देना उनको बहुत प्रिय है।ये भाव प्रधान देव है,भक्ति से प्रसन्न हो जाते है,तभी तो ये महादेव कहलाते है।
-:मेरा अनुभव:-
बात उन दिनों की है जब मै जीवन में साधना क्षेत्र के प्रथम पड़ाव पर संघर्ष कर रहा था,हनुमान जी तथा माता की उपासना हो रही थी परन्तु शिव के लिए बेचैनी हो जाती थी।कारण महादेव मुझे बहुत प्यारे लगते थे।कुछ साधक कहते शक्ति उपासक तो शिव के समान होते है,शिव तो काली के पैरो में पड़े रहते है,शक्ति उपासक को शिव से क्या लेना देना,यह बात सुन मैं पीड़ा से कराह उठता और लोगों से झगड़ पड़ता,कारण शिव की निन्दा सुनते मुझमें महान कोप पैदा हो जाता और लगता कि शिव के निन्दक को मै क्या करूं।शिव नहीं तो सृष्टि नहीं,सती ने शिव के अपमान के चलते ही तो दक्ष के यहाँ खुद को अग्नि में समर्पित कर दिया।यह है शिव शक्ति का प्रेम,क्या ये दोनों अलग हो सकते है?शिव ने ही मुझे स्वप्न में मंत्र दिया था।पर क्या शिव के बिना मैं साधना क्षेत्र में मन लगा पाऊँगा।तभी एक दिन बहुत मर्माहत था और सोचा जीना ही बेकार है सत्य के मार्ग पर चलना कितना कष्टकारी है,अब सहना बेकार है,उस रात मैंने सोच लिया था कि जीवन का अन्त कर लूंगा,लेकिन मेरी निराशा,मेरी विवशता शिव से छुप न सका।मेरे लाख चाहने पर भी मुझे नींद ने अपने आगोश मे ले लिया,तभी स्वप्न में शिव को शक्ति के साथ देखा।शिव ने मुझसे कहा क्या करने जा रहे थे,मैंने अपनी वेदना व्यक्त कि तो बोले कि हम सदा तेरे साथ है,फिर भी तुने मृत्यु की कामना क्यों की।देखो अपने प्रारब्ध को काटना पड़ता है तभी जाकर तुम जीवन को समझ पाओगे,आज से तुम्हारे कष्ट मैं कम कर रहा हूँ एक समय आयेगा जब तुमको सब कुछ मिल जायेगा साथ ही जगत के बहुत रहस्य से परिचित हो जाओगे,साथ ही अष्टभुजी माँ दुर्गा ने भी मुझसे कुछ कहा,तभी नींद से बाहर आया और आज तक फिर कोई निराशा मुझे छू नहीं पाया।
मैं आज यहाँ पार्थिव पूजन की विधि दे रहा हूँ इसे कोई भी कम समय में कर शिव की कृपा प्राप्त कर सकता है।शिव सबके अराध्य है एक बार भी दिल से कोई बस कहे "ॐ नमः शिवाय" फिर शिव भक्त के पास क्षण भर में चले आते है। 
-:पार्थिव शिव लिंग पूजा विधि:-
पार्थिव शिवलिंग पूजन से सभी कामनाओं की पूर्ति होती है।इस पूजन को कोई भी स्वयं कर सकता है।ग्रह अनिष्ट प्रभाव हो या अन्य कामना की पूर्ति सभी कुछ इस पूजन से प्राप्त हो जाता है।सर्व प्रथम किसी पवित्र स्थान पर पुर्वाभिमुख या उतराभिमुख ऊनी आसन पर बैठकर गणेश स्मरण आचमन,प्राणायाम पवित्रिकरण करके संकल्प करें।दायें हाथ में जल,अक्षत,सुपारी,पान का पता पर एक द्रव्य के साथ निम्न संकल्प करें।
-:संकल्प:-
"ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्री मद् भगवतो महा पुरूषस्य विष्णोराज्ञया पर्वतमानस्य अद्य ब्रह्मणोऽहनि द्वितिये परार्धे श्री श्वेतवाराह कल्पे वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशति तमे कलियुगे कलि प्रथमचरणे भारतवर्षे भरतखण्डे जम्बूद्वीपे आर्यावर्तेक देशान्तर्गते बौद्धावतारे अमुक नामनि संवत सरे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुक तिथौ अमुकवासरे अमुक नक्षत्रे शेषेशु ग्रहेषु यथा यथा राशि स्थानेषु स्थितेषु सत्सु एवं ग्रह गुणगण विशेषण विशिष्टायां अमुक गोत्रोत्पन्नोऽमुक नामाहं मम कायिक वाचिक,मानसिक ज्ञाताज्ञात सकल दोष परिहार्थं श्रुति स्मृति पुराणोक्त फल प्राप्तयर्थं श्री मन्महा महामृत्युञ्जय शिव प्रीत्यर्थं सकल कामना सिद्धयर्थं शिव पार्थिवेश्वर शिवलिगं पूजनमह करिष्ये।"


तत्पश्चात त्रिपुण्ड और रूद्राक्ष माला धारण करे और शुद्ध की हुई मिट्टी इस मंत्र से अभिमंत्रित करे...
"ॐ ह्रीं मृतिकायै नमः।"
फिर "वं"मंत्र का उच्चारण करते हुए मिटी् में जल डालकर "ॐ वामदेवाय नमःइस मंत्र से मिलाए।
१.ॐ हराय नमः,
२.ॐ मृडाय नमः,
३.ॐ महेश्वराय नमः बोलते हुए शिवलिंग,माता पार्वती,गणेश,कार्तिक,एकादश रूद्र का निर्माण करे।अब पीतल,तांबा या चांदी की थाली या बेल पत्र,केला पता पर यह मंत्र बोल स्थापित करे,
ॐ शूलपाणये नमः।
अब "ॐ"से तीन बार प्राणायाम कर न्यास करे।
-:संक्षिप्त न्यास विधि:-
विनियोगः-
ॐ अस्य श्री शिव पञ्चाक्षर मंत्रस्य वामदेव ऋषि अनुष्टुप छन्दःश्री सदाशिवो देवता ॐ बीजं नमःशक्तिःशिवाय कीलकम मम साम्ब सदाशिव प्रीत्यर्थें न्यासे विनियोगः।
ऋष्यादिन्यासः-
ॐ वामदेव ऋषये नमः शिरसि।ॐ अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे।ॐ साम्बसदाशिव देवतायै नमः हृदये।ॐ ॐ बीजाय नमः गुह्ये।ॐ नमः शक्तये नमः पादयोः।ॐ शिवाय कीलकाय नमः नाभौ।ॐ विनियोगाय नमः सर्वांगे।
शिव पंचमुख न्यासः ॐ नं तत्पुरूषाय नमः हृदये।ॐ मम् अघोराय नमःपादयोः।ॐ शिं सद्योजाताय नमः गुह्ये।ॐ वां वामदेवाय नमः मस्तके।ॐ यम् ईशानाय नमःमुखे।
कर न्यासः-
ॐ ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः।ॐ नं तर्जनीभ्यां नमः।ॐ मं मध्यमाभ्यां नमः।ॐ शिं अनामिकाभ्यां नमः।ॐ वां कनिष्टिकाभ्यां नमः।ॐ यं करतलकर पृष्ठाभ्यां नमः।
हृदयादिन्यासः-
ॐ ॐ हृदयाय नमः।ॐ नं शिरसे स्वाहा।ॐ मं शिखायै वषट्।ॐ शिं कवचाय हुम।ॐ वाँ नेत्रत्रयाय वौषट्।ॐ यं अस्त्राय फट्।
                                                      "ध्यानम्"
ध्यायेनित्यम महेशं रजतगिरि निभं चारू चन्द्रावतंसं,रत्ना कल्पोज्जवलागं परशुमृग बराभीति हस्तं प्रसन्नम।
पदमासीनं समन्तात् स्तुतम मरगणै वर्याघ्र कृतिं वसानं,विश्वाधं विश्ववन्धं निखिल भय हरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम्।
-:प्राण प्रतिष्ठा विधिः-
विनियोगः- 
ॐ अस्य श्री प्राण प्रतिष्ठा मन्त्रस्य ब्रह्मा विष्णु महेश्वरा ऋषयःऋञ्यजुःसामानिच्छन्दांसि प्राणख्या देवता आं बीजम् ह्रीं शक्तिः कौं कीलकं देव प्राण प्रतिष्ठापने विनियोगः।
ऋष्यादिन्यासः-
ॐ ब्रह्मा विष्णु रूद्र ऋषिभ्यो नमः शिरसि।ॐ ऋग्यजुः सामच्छन्दोभ्यो नमःमुखे।ॐ प्राणाख्य देवतायै नमःहृदये।ॐआं बीजाय नमःगुह्ये।ॐह्रीं शक्तये नमः पादयोः।ॐ क्रौं कीलकाय नमः नाभौ।ॐ विनियोगाय नमःसर्वांगे। अब न्यास के बाद एक पुष्प या बेलपत्र से शिवलिंग का स्पर्श करते हुए प्राणप्रतिष्ठा मंत्र बोलें।
प्राणप्रतिष्ठा मंत्रः-
ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं शिवस्य प्राणा इह प्राणाःॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं शिवस्य जीव इह स्थितः।ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं शिवस्य सर्वेन्द्रियाणि,वाङ् मनस्त्वक् चक्षुः श्रोत्र जिह्वा घ्राण पाणिपाद पायूपस्थानि इहागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा।अब नीचे के मंत्र से आवाहन करें।
आवाहन मंत्रः-
ॐ भूः पुरूषं साम्ब सदाशिवमावाहयामि,ॐ भुवः पुरूषं साम्बसदाशिवमावाहयामि,ॐ स्वः पुरूषं साम्बसदाशिवमावाहयामि।अब शिद्ध जल,मधु,गो घृत,शक्कर,हल्दीचूर्ण,रोड़ीचंदन,जायफल,गुलाबजल,दही,एक,एक कर स्नान कराये",नमःशिवाय"मंत्र का जप करता रहे,फिर चंदन, भस्म,अभ्रक,पुष्प,भांग,धतुर,बेलपत्र से श्रृंगार कर नैवेद्य अर्पण करें तथा मंत्र जप या स्तोत्र का पाठ,भजन करें।अंत में कपूर का आरती दिखा क्षमा प्रार्थना का मनोकामना निवेदन कर अक्षत लेकर निम्न मंत्र से विसर्जन करे,फिर पार्थिव को नदी,कुआँ,या तालाब में प्रवाहित करें।
विसर्जन मंत्रः-
गच्छ गच्छ गुहम गच्छ स्वस्थान महेश्वर पूजा अर्चना काले पुनरगमनाय च।   

Saturday, July 9, 2011

"महामृत्युञ्जय शिव".....(प्राणों के रक्षक)

शिव आदि देव है।शिव को समझना या जानना सब कुछ जान लेना जैसा हैं।अपने भक्तों पर परम करूणा जो रखते है,जिनके कारण यह सृष्टि संभव हो पायी है,वह एकमात्र शिव ही है।शिव इस ब्रह्माण्ड में सबसे उदार एवं कल्याणकारी हैं।अनेक रुपों में शिव सिर्फ दाता हैं।सम्पूर्ण लोक के सभी देवता और देवियाँ महा ऐश्वर्यशाली हैं,परन्तु शिव के पास सब कुछ रहते हुए भी वे वैरागी हैं।कारण वे ही निराकार और साकार पूर्ण ब्रह्म हैं।शिव पल पल कितने विष पीते है,कहना क्या?दक्ष प्रजापति ने अपनी पुत्री सती का कन्यादान किया था,शिव दमाद थे।परन्तु एक बार किसी सभा में सभी देवों की उपस्थिती में दक्ष के आने पर सभी देवता और ॠषिगण सम्मान में दक्ष को प्रणाम करने लगे,परन्तु शिव कुछ नही बोले।इस बात को स्वयं का अनादर समझ कर दक्ष शिव को भूतों का स्वामी,वेद से बहिष्कृत रहने वाला कह अपमान करने लगे,परन्तु शिव ने कुछ नहीं कहा।
कुछ काल बाद दक्ष प्रजापति ने एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन कनखल क्षेत्र में रखा सभी देवी,देवता,ॠषि,मुनि सहित असुर,नवग्रह,नक्षत्र मण्डल को भी निमंत्रित किया परन्तु शिव को नही बुलाया।कारण शिव के अपमान के लिए ही यज्ञ रखा गया था।शिव भक्त दधिचि शिव के बिना यज्ञ को अमंगलकारी बताकर वहां से चले गये।अभिमानी लोगों का यही हाल है वो थोड़ी सी शक्ति आ जाने पर अपने को सर्वज्ञ समझ लेते है।रोहिणी संग चन्द्रमा को जाते देख सती को जब इस बात का ज्ञान हुआ कि मेरे पिता के यहां यज्ञ में ये जा रहे है तो आश्चर्य हुआ कि हमे क्यों नही बुलाया?वे शिव जी के समीप जाकर बोली कि स्वामी मेरे पिता ने हमें यज्ञ में नहीं बुलाया फिर भी मैं जाना चाहती हूँ।सती को शिव नें समझाया कि बिन बुलाए जाना मृत्यु के समान हैं,परन्तु सति द्वारा हठ करने पर शिव ने आज्ञा प्रदान की।यज्ञ में जब शिव की निन्दा सुन सती ने आत्मदाह कर लिया तो शिव ने अपनी जटा से वीरभद्र तथा कालिका को प्रकट कर असंख्य गणों के साथ दक्ष यज्ञ के विनाश के लिए भेजा।क्या परिणाम हुआ अंहकारी,देव,दानव के साथ दक्ष का भी सिर मुण्डन हो गया।फिर शिव की दया ही थी कि ब्रह्मा जी के स्तुति से प्रसन्न होकर दक्ष को पशु मुख देकर अभय दान प्रदान किया।
शिव है तो सारी सृष्टि हैं।शिव का एक रूप है "महामृत्युञ्जय" जो सभी को अमृत प्रदान करते है।आज प्रकृति हमारे विरूद्ध हो गई है,कारण हम उस दिव्य प्रकृति को ही नष्ट कर रहे हैं।हम शायद ज्यादा बुद्धिमान वैज्ञानिक हो गये है।इतने ही अगर हम योग्य हो गये है तो,महामारी,भूकम्प और गंगा आदि नदीयों की अशुद्धता,आसुरी बुद्धि चिंतन को बदलने का विज्ञान क्यों नहीं ढूढँ लेते हैं।हर युग में विज्ञान रहा है।द्वापर में कृष्ण के समय भी इस सृष्टि में आसुरी प्रवृति की कमी नहीं थी,तभी तो महाभारत जैसा युद्ध हुआ था।आज उन्हीं आसुरी जीवों का ज्यादा विकास हो रहा समाज में,शिव को मनाना होगा स्तुति से प्रसन्न करना होगा तभी संतुलन होगा।भक्ती तो आज बहुत से लोग कर रहे है।भगवत कृपा,दिव्य दर्शन भी ज्यादा से ज्यादा हो रहे है,परन्तु हमारी आँखे कभी प्रभु को खोजती भी हैं क्या।शिव तो सदा हमारे सामने ही खड़े है क्या हम उन्हें देख पाते है,नहीं!कारण हमेशा व्यर्थ की चीजों को देख अपनी आँखो को थका लेते है,जिस कारण से अब उर्जा ही नहीं रही तीसरे नेत्र से देखने की हममे।शिव व्याकुल हैं हमारे लिए पर हमे तो भक्ति करने का भी ढंग नही है।हमे भी तो शिव के लिए व्याकुल होना पड़ेगा।हम दुशमन है अपने परिवार के,अपनी संतान के अपनी नयी पीढी के जिसे अपने अंहकार वश विंध्वस के राह पर ले जा रहे है,कारण शरीर,मन,बुद्धि से हम रोगग्रस्त है।यहाँ बस शिव मृत्युञ्जय की अराधना से ही हम स्वस्थ हो पायेंगे।इस विषम परिस्थितियों से बचने के लिए शिव कृपा ही एकमात्र सहारा है।मृत्यु क्या है?सिर्फ शरीर के मृत्यु की बात नहीं हैं यह,हमारे इच्छाओं की मृत्यु।हमारे जीवन की बहुत सी भौतिक जरूरते,वंश और समाज की अवनति तथा कोई भी अभाव मृत्यु ही तो हैं।
 -:अनुभव:-
मैंने जीवन में इतने प्रयोग किये है,करवाये है और देखे है की लिखूँ तो एक वृहद पुस्तक का रूप ले लेंगे।माँ काली की साधना के दौरान १० लाख मंत्र जप के बाद जब मेरा शरीर जर्जर होकर रोग ग्रस्त हो गया था तब बहुत से उपाय,दवा और दुआ के बाद भी मैं ठीक न हो सका था।मैं समझ गया अब बचना मुश्किल है,क्या करूं बच्चे अभी छोटे है इनका क्या होगा।एक रात यूँही चुपचाप रोते रोते नींद आ गई तभी मैने देखा एक विचित्र वेषभूषा में एक आदमी मेरे पास आकर बोलता है कि तुम बच नहीं सकते,तुम्हें मरना पड़ेगा।और तभी ११,१२ वर्ष के उम्र के गौर वर्ण शिव प्रकट हुए बालक रूप में।ये तो बटुक भौरव लगते है कहता हुआ और उन्हें देख वह आदमी भाग गया और मैं तो भाव विह्वल होकर बस उन्हें प्रणाम करने लगा।उन्होनें कुछ आदेश दिया,कुछ गोपनीय बात बतायी,और चले गये।मैं प्रथम बार काशी की यात्रा कर श्री विश्वनाथ जी का दर्शन किया।रात्री ८ बज रहे थे,हल्की बारिश की फुहार हो रही थी।मैं मणिकर्णिका घाट पर था तभी एक,अघोरी स्त्री ने आकर मुझे मृत्युञ्जय मंत्र नित्य दिन में जप करने को कहा।ये स्त्री कौन है,सोच ही रहा था कि वह न जाने कहां लोप हो गई।प्रातः से मैने मंदिर में जप शूरू किया और उसी दिन लगा कि अब मैं पूर्ण स्वस्थ हूँ।कितनी ऐसी घटना है,शिव बाबा के करुणा और स्नेह की।
-:संदेश:-
पुराण की कथा लोग ठीक से समझ जाये तो मर्म समझ में आ जायेगा।सती महाशक्ति थी,वह जानती थी,कि शिव से वियोग होने वाला है।शिव निराकार ब्रह्म है परन्तु साकार रूप बस मेरी खातिर ही धरे हैं मैं उनकी आत्मा हूँ।मेरा अगला अवतरण हिमालय के यहाँ होगा तब तक शिव समाधि में रहेगे इसी कारण जाने के पूर्व दश महाविद्या के रूप में शिव के दशों दिशा में विराजमान हो गई।शिव ही सभी कुछ है,शिव ही माँ है,"माँ" ही शिव है,ये दो होते हुए भी एक ही हैं।शिव,शक्ति का अमिट प्रेम ही सत्य है तभी तो कहा गया "सत्यम शिवम सुन्दरम्"।
मृत्युञ्जय शस्त्र विहीन है पर उनकी शक्ति अमृतेश्वरी पीताम्बरा माता हैं।जो कहती है "देते रहिये शिव,बांटते रहिए,जीव पर करूणा बरसाते रहिये,मैं तो अमृत कुण्ड की स्वामिनी हूँ और आप मेरे स्वामी है।" यही शिवशक्ति का संबध है।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             -:मंत्र प्रयोग:-
मूल मंत्र में संपुट लगा देने से यह मंत्र महामृत्युञ्जय हो जाता है।लघु मृत्युंजय तथा बहुत से ऐसे मंत्र है,जिसका जप किया जाता है।जीव को मृत्यु मुख से खींच लाते है,मृत्युंजय।आज तो हमेशा भय लगा रहता है कि कब क्या हो जाय।ग्रह के अशुभ दशा या दैविक,दैहिक प्रभाव,तंत्र या कोई भी अनिष्टकारी प्रभाव को दूर कर देते है पल में।पुरा परिवार सुरक्षित रहता है,छोटा रोग हो या असाध्य बिमारी,आपरेशन हो या महामारी,कोई खो जाय या कोई भी संकट आन पड़े मृत्युंजय की कृपा से सब कुछ अच्छा हो जाता हैं।मृत्युंजय मंत्र ३२ अक्षर का "त्र्यम्बक मंत्र" भी कहलाता हैं ।"ॐ" लगा देने से यह ३३ अक्षर का हो जाता हैं,इस मंत्र में संपुट लगा देने से मंत्र का कई रूप प्रकट हो जाता है।गायत्री मंत्र के साथ प्रयोग करने पर यह "मृतसंजीवनी मंत्र" हो जाता हैं।मंत्र प्रयोग के लिए "शिव वास" देखकर ही जप शुरू करें।शिव मंदिर में मंत्र जप करने पर कोई नियम की पाबन्दी नहीं हैं।यदि घर में पूजन करते है तो पहले पार्थिव शिव पूजन करके या चित्र का पूजन कर घी का दीपक अर्पण कर,पुष्प,प्रसाद के साथ कामना के लिए दायें हाथ में जल,अक्षत लेकर संकल्प कर ले।कितनी संख्या में जप करना है यह निर्णय कर ले साथ ही जप माला रूद्राक्ष का ही हो।एक निश्चित संख्या में ही जप होना चाहिए।हवन के दिन "अग्निवास" देख लेना चाहिए।आज मै "मृत्युंजय प्रयोग" दे रहा हूँ,विधि संक्षिप्त हैं पूरी श्रद्धा के साथ प्रयोग करे,और शिव कृपा देखे।साथ ही शिव पार्थिव पूजन विधि श्रावण में दे दूंगा।गुरू,गणेश पूजन के बाद शिव पूजन कर,पूर्व दिशा में ऊनी आसन पर बैठ एकाग्र चित जप करना चाहिये।आचमनी निम्न मंत्र से कर संकल्प कर ले।दाएँ हाथ मे जल लेकर मंत्र बोले 
मंत्र
१.ॐ केशवाय नमः।जल पी जाए।
२.ॐ नारायणाय नमः।जल पी जाए।
३.ॐ माधवाय नमः।जल पी लें।
अब हाथ इस मंत्र से धो ले।४.ॐ हृषिकेषाय नमः।

अब संकल्प करे।संकल्प अपने कामना अनुसार छोटा,बड़ा कर सकते है।दाएँ हाथ में जल,अक्षत,बेलपत्र,द्रव्य,सुपारी रख संकल्प करें।
संकल्प 
"ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुःश्रीमद् भगवतो महापूरूषस्य,विष्णुराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य ब्रह्माणोऽहनि द्वितीये परार्धे श्री श्वेत वाराहकल्पे,वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशति तमे कलियुगे कलि प्रथमचरणे भारतवर्षे भरतखण्डे जम्बूद्वीपे आर्यावर्तैक देशान्तर्गते अमुक संवतसरे महांमागल्यप्रद मासोतमे मासे अमुक मासे अमुकपक्षे,अमुकतिथौःअमुकवासरे,अमुक गोत्रोत्पन्नोहं अमुक शर्माहं,या वर्माहं ममात्मनःश्रुति स्मृति,पुराणतन्त्रोक्त फलप्राप्तये मम जन्मपत्रिका ग्रहदोष,दैहिक,दैविक,भौतिक ताप सर्वारिष्ट निरसन पूर्वक सर्वपाप क्षयार्थं मनसेप्सित फल प्राप्ति पूर्वक,दीर्घायु,विपुलं,बल,धन,धान्य,यश,पुष्टि,प्राप्तयर्थम सकल आधि,व्याधि,दोष परिहार्थम सकलाभीष्टसिद्धये श्री शिव मृत्युंजय प्रीत्यर्थ पूजन,न्यास,ध्यान यथा संख्याक मंत्र जप करिष्ये।"
गणेश प्रार्थना
गजाननं भूतगणादि सेवितं कपित्थजम्बू फलचारूभक्षणम्।उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम्॥नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय,गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥ॐ श्री गणेशाय नमः।

गुरू प्रार्थना 
गुरूर्ब्रह्मा,गुरूर्विष्णु,गुरूर्देवो महेश्वरः।गुरू साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरूवे नमः॥

गौरी प्रार्थना
ॐ नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्मताम्॥
                            
  विनियोग 
अस्य त्र्यम्बक मन्त्रस्य वसिष्ठ ऋषिःअनुष्टुप छन्दःत्र्यम्बक पार्वतीपतिर्देवता,त्र्यं बीजम्,वं शक्तिः,कं कीलकम्,सर्वेष्टसिद्धयर्थे जपे विनियोगः।
ऋष्यादिन्यास
 ॐ वसिष्ठर्षये नमःशिरसि।अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे।त्र्यम्बकपार्वतीपति देवतायै नमः हृदि।त्र्यं बीजाय नमः गुह्ये।वं शक्तये नमः पादयोः।कं कीलकाय नमः नाभौ।
विनियोगाय नमःसर्वागें।
करन्यास
त्र्यम्बकम् अंगुष्ठाभ्यां नमः।यजामहे तर्जनीभ्यां नमः।सुगंधिं पुष्टिवर्द्धनं मध्यमाभ्यां नमः।उर्वारूकमिव बन्धनात् अनामिकाभ्यां नमः।मृत्योर्मुक्षीय कनिष्ठिकाभ्यां नमः।मामृतात् करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
हृदयादिन्यास
ॐ त्र्यम्बकं हृदयाय नमः।यजामहे शिरसे स्वाहा।सुगन्धिं पुष्टिवर्द्धनं शिखायै वषट्।उर्वारूकमिव बन्धनात् कवचाय हुं।मृत्योर्मुक्षीय नेत्रत्रयाय वौषट्।मामृतात् अस्त्राय फट्।
ध्यान
हस्ताभ्यां कलशद्वयामृतरसैराप्लावयन्तं शिरो द्वाभ्यां तौ दधतं मृगाक्षवलये द्वाभ्यां बहन्तं परम्।अंकन्यस्तकरद्वयामृतघटं कैलासकान्तं शिवं स्वच्छाम्भोजगतं नवेन्दुमुकुटं देवं त्रिनेत्रं भजे।
मंत्र
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
हवन विधि
जप के समापन के दिन हवन के लिए बिल्वफल,तिल,चावल,चन्दन,पंचमेवा,जायफल,गुगुल,करायल,गुड़,सरसों धूप,घी मिलाकर हवन करे।रोग शान्ति के लिए,दूर्वा,गुरूचका चार इंच का टुकड़ा,घी मिलाकर हवन करे।श्री प्राप्ति के लिए बिल्वफल,कमलबीज,तथा खीर का हवन करे।ज्वरशांति में अपामार्ग,मृत्युभय में जायफल एवं दही,शत्रुनिवारण में पीला सरसों का हवन करें।हवन के अंत में सुखा नारियल गोला में घी भरकर खीर के साथ पुर्णाहुति दें।इसके बाद तर्पण,मार्जन करे।एक कांसे,पीतल की थाली में जल,गो दूध मिलाकर अंजली से तर्पण करे।मंत्र के दशांश हवन,उसका दशांश तर्पण,उसका दशांश मार्जन,उसका दशांश का शिवभक्त और ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए।तर्पण,मार्जन में मूल मंत्र के अंत मे तर्पण में "तर्पयामी" तथा मार्जन मे "मार्जयामी" लगा लें।अब इसके दशांश के बराबर या १,३,५,९,११ ब्राह्मणों और शिव भक्तों को भोजन कर आशिर्वाद ले।जप से पूर्व कवच का पाठ भी किया जा सकता है,या नित्य पाठ करने से आयु वृद्धि के साथ रोग से छुटकारा मिलता है।
मृत्युञ्जय कवच
विनियोग
अस्य मृत्युञ्जय कवचस्य वामदेव ऋषिःगायत्रीछन्दः मृत्युञ्जयो देवता साधकाभीष्टसिद्धर्यथ जपे विनियोगः।
ऋष्यादिन्यास
वामदेव ऋषये नमःशिरसि,गायत्रीच्छन्दसे नमःमुखे,मृत्युञ्जय देवतायै नमःहृदये,विनियोगाय नमःसर्वांगे।
करन्यास
ॐ जूं सःअगुष्ठाभ्यां नमः।ॐ जूं सः तर्जनीभ्यां नमः।ॐजूं सः मध्याभ्यां नमः।ॐजूं सःअनामिकाभ्यां नमः।ॐजूं सःकनिष्ठिकाभ्यां नमः।ॐजूं सःकरतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
हृदयादिन्यास
ॐजूं सः हृदयाय नमः।ॐजूं सःशिरसे स्वाहा।ॐजूं सःशिखायै वषट्।ॐजूं सःकवचाय हुं।ॐजूंसःनेत्रत्रयाय वौषट्।ॐजूं सःअस्त्राय फट्।
ध्यान
हस्ताभ्यां.....उपरोक्त ध्यान ही पढ ले।
शिरो मे सर्वदा पातु मृत्युञ्जय सदाशिवः।स त्र्यक्षरस्वरूपो मे वदनं च महेश्वरः॥
पञ्चाक्षरात्मा भगवान् भुजौ मे परिरक्षतु।मृत्युञ्जयस्त्रिबीजात्मा ह्यायू रक्षतु मे सदा॥
बिल्ववृक्षसमासीनो दक्षिणामूर्तिरव्ययः।सदा मे सर्वदा पातु षट्त्रिंशद् वर्णरूपधृक्॥
द्वाविंशत्यक्षरो रूद्रः कुक्षौ मे परिरक्षतु।त्रिवर्णात्मा नीलकण्ठः कण्ठं रक्षतु सर्वदा॥
चिन्तामणिर्बीजपूरे ह्यर्द्धनारीश्वरो हरः।सदा रक्षतु में गुह्यं सर्वसम्पत्प्रदायकः॥
स त्र्यक्षर स्वरूपात्मा कूटरूपो महेश्वरः।मार्तण्डभैरवो नित्यं पादौ मे परिरक्षतु॥
ॐ जूं सः महाबीज स्वरूपस्त्रिपुरान्तकः।ऊर्ध्वमूर्घनि चेशानो मम रक्षतु सर्वदा॥
दक्षिणस्यां महादेवो रक्षेन्मे गिरिनायकः।अघोराख्यो महादेवःपूर्वस्यां परिरक्षतु॥
वामदेवः पश्चिमायां सदा मे परिरक्षतु।उत्तरस्यां सदा पातु सद्योजातस्वरूपधृक्॥

इस कवच को विधि विधान से अभिमंत्रित कर धारण करने का विशेष लाभ हैं।महामृत्युञ्जय मंत्र का बड़ा महात्मय है।शिव के रहते कैसी चिन्ता ये अपने भक्तों के सारे ताप शाप भस्म कर देते है।शिव है तो हम है,यह सृष्टि है तथा जगत का सारा विस्तार है,शिव भोलेभाले है और उनकी शक्ति है भोली शिवा,यही लीला हैं।                                  

Wednesday, June 22, 2011

"श्री गणेश":-(शिव शक्ति के प्यारे)

माता-पिता के लिए संतान ही सबकुछ होता है।सर्वोपरि और परम माता- पिता शिव-शक्ति है इन्हें हम प्रकृति और पूरूष कहते है ये निराकार एवं निर्गुण है परन्तु बिना साकार के हम आंनदित नहीं हो सकते।कारण हम स्वयं साकार है,पहले जो साकार की लीला देखेगा वही तो निराकार के रहस्य से परिचित होगा।इस प्रकृति और पूरूष का जो परम प्रेम है वह श्री गणेश है और षडानन श्री कार्तिकेय जी है।ये दोनो पुत्र सृष्टि मे बड़े प्यारे है।शिव तो शक्ति के हृदय में रहते है और शिव के हृदय में रूद्र रूप हनुमान भक्ति से पूर्णरुपेण चैतन्य विराज रहे है।
वही श्री हनुमान के हृदय में श्री सीताराम जी विराज रहे है जो साक्षात विष्णु है।ये आकाश तत्व में महाशुन्य है जो चराचर जगत में व्याप्त है यही आदि गणेश है।शक्ति के गोद मे दुलार,प्यार कौन पायेगा,वही जो सनातन माता- पिता का पुत्र होगा।शिव-शक्ति का प्रेम अमिट है तथा संसार के सभी जीव इन्हीं की संतान है लेकिन जब शक्ति ने अपने उबटन से एक शिशु की मूर्ति बनाकर प्राण-प्रतिष्ठा का मंत्र फूंका तो एक सुन्दर बालक के रूप में श्री गणेश प्रकट हुए।गणेश क्या है मंगलदाता,भाग्य-विधाता।कारण एक बार गुरू गोरखनाथ जी ने दत्तात्रेय जी से पूछा कि कौन मुक्त है,कौन बन्धन दुःख में है,कौन नष्ट होता है और कौन अजर अमर है?यदि यह प्रकट करने योग्य हो तो आप इस पर प्रकाश डालिये।दत्तात्रेय जी ने कहा कि ब्रह्म मुक्त है,और प्रकृति दुःख सहती है।यही अपार गुप्त ज्ञान है।प्रकृति अपने दुःख के निवारण के लिए ही श्री गणेश की उत्पति से अपने सारे संतानो की पीड़ा हरती है तभी तो ब्रह्म शिव भी पुत्र प्रेम में गणपति को गोद मे बिठाये भक्तों का कल्याण करते है।इसलिये मातृॠण से मुक्त होने के लिये सभी जीव को शक्ति उपासना करनी चाहिये और वहाँ प्रथम पूज्य श्री गणेश को प्रसन्न किये बिना शक्ति की कृपा प्राप्त नहीं होती।गणेश जी के आशीर्वाद के फलस्वरुप ही माता-पिता जीव पर सबसे ज्यादा करूणा बरसाते हैं।बुद्धि के दाता श्री गणेश का हमारे शरीर में आधार चक्र के पास निवास का यहीं कारण हैं कि शक्ति के साथ ये सदैव विराजमान है,शिव तो आज्ञा चक्र से सहस्त्रसार मे बैठे है वहाँ तक पहुँचना बहुत कठिन है और नीचे शक्ति अलसायी सोयी रहती है।जब श्री गणेश की कृपा साधक पर होती है तो वे माँ को जगाकर ऊपर भागते है,तो शक्ति पुत्र के पिछे भागती है।अब तो साधक का कल्याण होना निश्चित ही है कारण गणेश हँसते खिलखिलाते शिव के गोद में जाकर बैठ जाते है,जिससे माँ भी अपने पुत्र के मोह और प्रेम वश शिव के पास पहुँच वामभाग में विराज जाती हैं।तब जीव समाधि में जाकर उस परम तत्व माता पिता का दर्शन कर लेता हैं,ऐसे कृपालु हैं हमारे गणेश।जीवन में बहुत पीड़ा हैं जीव को पर गणेश हर उस पीड़ा से निकाल बाहर करते है पल में।कितने स्वरूप में है गणेश जी विराजमान और उनकी अनेकानेक लीलाएँ है तभी तो गणेश प्रथम पूज्य है।कितना भी साधना उपासना कर लिजिये लेकिन श्री गणेश जी के कृपा के बिना आगे बढ पाना सम्भव ही नहीं।जिस त्रिपुर सुन्दरी को एक बार देखने के लिए साधक पुरा जीवन साधना में समर्पित कर देता है उस माँ के गोद में गणेश हँसते खिलखिलाते माँ को मोह में बाँधे रहते हैं।आदि शंकराचार्य के समय की एक घटना है।एक सिद्ध माता का मंदिर बन्द था कारण वह प्राचीन तांत्रिक पीठ था तथा वहाँ शक्ति कुपित हो गई थी।उस समय कितने साधक मंदिर के अन्दर गये लेकिन बाहर कभी नहीं निकल पाये।तभी एकबार वहाँ शंकराचार्य जी पहुँच गये तथा एक गणेश मूर्ति को प्राणप्रतिष्ठा कर गणेश स्तोत्र का पाठ करते हुये अन्दर पहुँच गये,अब तो जैसे ही माँ शक्ति श्री गणेश को देखी प्रसन्न हो गई और हमेशा के लिये वह मंदिर खुल गया,ऐसे है हमारे श्री गणेश जी।पति पत्नि में चाहे मतभेद रहता हो,सारे रिश्ते कही न कही तनाव पैदा कर देते हो परन्तु संतान सभी को प्यारा है कारण संतान में जीव को गणेश,कार्तिक दिखाइ देते है।सारा व्रत,उपवास,पूजन लोग अपने संतान को सुखी रखने के लिये ही करते है। जीवन में सारा पूर्व अर्जित पुण्य प्रताप संतान के दुःख मिटाने में ही लग जाता है,ऐसा होता है माता पिता का प्रेम।माता पिता के उस प्रेम की लाज श्रीगणेश शिव-शक्ति के पास रखते है और सारी अशुभता को दूर कर मंगल प्रदान करते हैं।गणेश की उपासना मात्र से सृष्टि के सभी देवी देवता कृपा करते हैं।एक बार एक भक्त स्त्री अर्धपागल हो गई,कारण किसी देवी मंदिर में कुछ गलती के कारण ऐसा हो गया था।मैंने गणेश मंत्र के साथ गणेश यंत्र दे दिया,कुछ ही दिनों में स्त्री पुर्ण ठीक हो गई तथा माता ने स्वप्न में दर्शन देकर आशिर्वाद भी दिया।अगर गणेश नहीं होते तो इस सृष्टि का कार्य सुचारू रूप से नहीं चल पाता,इसलिये माता ने सभी जीव पर विशेष कृपा कर श्रीगणेश की उत्पति कर उन्हें गजानन बनाकर सृष्टि में प्रथम पूज्य बना दिया।गणेश शीघ्र प्रसन्न होकर,भक्त के सारे अमंगल को हर कर मंगल प्रदान करते है।अनेकानेक लीलाएँ है गजानन की, ये ग्रह दोष,या कोई बाधा तत्क्षण दूर कर भक्त की मनोकामना पूर्ण कर देते हैं।"आज मै यहाँ श्रीगणेश की स्तुति पाठ दे रहा हूँ।एक मोदक या बेसन के प्रसाद के साथ ११ दूर्वा और सिन्दूर अर्पण कर गणेश जी का एक बार भी पाठ कर लिया जाय तो विघ्नों का शमन होता है और जीवन के हर कार्य में सफलता मिलता रहता है निरंतर।"
 -:श्रीगणेश स्तुति:-
चतुर्भुजं रक्ततनुं त्रिनेम् पाशांकुशौ मोदकपात्र दन्तौ।करैर्दधानं सरसीरूहस्थं,गणाधिनाथं शशिचूडमीडे॥
गजाननं भूतगणादि सेवितं कपित्थ जम्बूफल चारूभक्षणम्।उमासुतं शोकविनाशकारकं,नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजम्॥
अलिमण्डल मण्डित् गण्ड थलं तिलकीकृत कोमलचन्द्रकलम्।कर घात विदारित वैरिबलं,प्रणमामि गणाधिपतिं जटिलम्॥
खर्व स्थूलतनुं गजेन्द्रवदनं लम्बोदरं सुन्दरम्।प्रस्यन्दन्मदगन्धलुब्ध मधुपव्यालोल गण्डस्थलम्।दन्ताघात विदारितारि रूधिरैःसिंदूरशोभाकरं,वन्दे शैलसुता सुतं गणपतिं सिद्धिप्रदं कामदम्॥
नमो नमःसुरवर पूजितांघ्रये,नमो नमःनिरूपम मंगलात्मने।नमो नमःविपुल पदैक सिद्धयै,नमो नमः करिकलभाननाय ते॥
शुक्लाम्बरं धरं देवं,शशिवर्ण चतुर्भुजम्,प्रसन्न वदनं ध्यायेत,सर्वविघ्नोपशान्तये॥गणपतिर्विघ्नराजो लम्बतुण्डो गजाननः,मातुरश्च हेरम्ब एकदन्तो गणाधिपः॥
वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्य समप्रभः।निर्विघ्न कुरू मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।सर्व विघ्न विनाशाय सर्व कल्याण हेतवे,पार्वती प्रियपुत्राय गणेशाय नमो नमः॥
प्रातःस्मरामि गणनाथमनाथ बन्धु,सिंदूरपूर्ण परिशोभित गण्ड युग्मम्,उद्दण्डविघ्नपरिखण्डन चण्ड दण्डमाखण्डलादि सुरनायक वृन्द वन्द्यम्॥
प्रातर्नमामि चतुरानन वन्द्यमानं,इच्छानुकूलमखिलं च वरं ददानम्।तं तुन्दिलं द्विरसनाधिपयज्ञसूत्रं,पुत्रं विलास चतुरै शिवयोःशिवाय॥
प्रातर्भजाम्यभयदं खलु भक्त शोकं,दावानलं गणविभुं वरकुञ्जरास्यम्।अज्ञान कानन विनाशन हव्यवाहमुत्साहवर्द्धनमहं सुतमीश्वरस्य॥
                                       
    -:द्वादश गणेश स्तुति:-
प्रणम्य शिरसा देवं,गौरीपुत्र विनायकम्।भक्तावासं स्मरेन्नित्यं आयुःकामार्थ सिद्धये॥प्रथमं वक्रतुण्ड च एकदन्तं द्वितीयकम।तृतीय कृष्णपिंगाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम्॥
लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च।सप्तमं विघ्नराजं च धूम्रवर्ण तथाष्टकम्॥नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकं।एकादशं गणपतिं,द्वादशं तु गजाननम्॥
द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः।न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो॥

रात्री के बारह बज रहे थे,माँ का जप हो रहा था।विरह वेदना से प्राण व्याकुल हो गये थे,तभी ध्यान में गणेश आ गये।वे मुस्कुरा रहे थे तभी मैंने ध्यान से उन्हें अलग कर खुद को माँ के चरणों पर केंद्रित करना चाहा पर लाख चाहने पर भी गणेश टस से मस नहीं हुये।"आखिर चाहते क्या हो गणेश" तभी गुरू जी ध्यान में आकर बोले.....।गणेश का जप कर मना लो माँ को,माँ गणेश जी के पिछे खड़ी है।अब मैं गणपति गणपति कह रोने लगा तभी श्रीगणेश ने अपना सूंड़ मेरे माथे पर रख दिया।आगे जो हुआ वह मै यहाँ बता नहीं सकता।हिन्दू धर्म में बिना गणेश जी की कृपा प्राप्त किये कुछ भी संभव नहीं है।
कार्तिक जी शिव के त्रिनेत्र के तेज से प्रकट हुये है।ये दक्षिण भारत के ईष्ट देवता है,वे अपने पिता शिव के प्रचार के साथ शिव तत्व की प्राप्ति में जीव को तल्लीन रखते है।ये शिव शक्ति के प्रिय पुत्र है।

Sunday, May 1, 2011

मंत्र प्रयोग



गृह रक्षा- गाय का गोबर या लाल रंग का घोल लेकर उक्त मंत्र से १०८बार पढ़कर अभिमंत्रित कर लें फिर इसी मंत्र को पढ़ते हुए घर के चारों ओर रेखा खींच दें।ऐसा कर देने से घर में भूत,पिशाच,चोर डाकू के घुसने का भय नहीं रहता।साथ ही हिंसक जंतु,अग्नि भय से भी सुरक्षित रहा जा सकता हैं।
मंत्र- ॐ ह्रीं चण्डे!चामुण्डे भ्रुकुटि अट्टा ट्टे,भीम दर्शने!रक्ष रक्ष चौरेभ्यःवज्रेभ्यःअग्निभ्यःश्वापदेभ्यःदुष्टजनेभ्यःसर्वेभ्यःसर्वौपद्रवेभ्यःगण्डीःह्रीं ह्रीं ठःठः।


टोना टोटका तंत्र बाधा निवारण मंत्र- आज यह भी देखने को मिलता है कि कुछ दुष्ट लोग किसी टोना करने वाले से कोई प्रयोग करा देते है और लोग भयानक कष्ट भोगने लगते है।
दवा करने पर भी लाभ नहीं मिलता है,तब इस मंत्र को ११ माला से सिद्ध कर प्रयोग करे।लोग जादू टोना से प्रभावित होकर विक्षिप्त भी हो जाते है।किसी शुभ मूर्हूत मे ईस मंत्र का प्रयोग करें।एक दीपक जलाकर किशमिश का भोग लगा कर मंत्र सिद्ध करे,फिर प्रयोग करते समय ७बार मंत्र पढ़ फूंक मारकर उतारा कर दें।ऐसा ७बार कर देने पर सभी जादू टोना नष्ट हो जाता हैं।बाद मे एक सफेद भोजपत्र पर अष्टगंध की स्याही से अनार के कलम से मंत्र लिख ताँबा या चाँदी की ताबीज मे यंत्र भरकर काला धागा लगाकर स्त्री हो तो बांया पुरूष हो तो दांये बांह मे ७बार मंत्र पढ़ बाँध ले।
शाबर मंत्र- ॐ नमो आदेश गुरू को।ॐ अपर केश विकट भेष।खम्भ प्रति पहलाद राखे,पाताल राखे पाँव।देवी जड़घा राखे,कालिका मस्तक रखें।महादेव जी कोई या पिण्ड प्राण को छोड़े,छेड़े तो देवक्षणा भूत प्रेत डाकिनी,शाकिनी गण्ड ताप तिजारी जूड़ी एक पहरूँ साँझ को सवाँरा को कीया को कराया को,उल्टा वाहि के पिण्ड पर पड़े।इस पिण्ड की रक्षा श्री नृसिंह जी करे।शब्द साँचा,पिण्ड काचा।फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा।
गठिया रोग और वात वेदना-
गठिया या वात रोग से लोग बहुत प्रभावित होकर हमेशा दवा खाते रहते है,इस प्रयोग को करे,लाभ होगा।किसी पर्वकाल मे मंत्र को सिद्ध करे।बाद में सन्धि वात या गठिया,वात या कमर में बाई,वात बेदना वाले रोगी को मंगल या रवि को मोर पंख से २१ बार उक्त मंत्र पढ़कर झाड़े।११ माला जप कर मंत्र सिद्ध कर लें।
मंत्र- ॐ मूल नमःधुक्ष नमः।जाहि जाहि ध्वाक्ष तमःप्रर्कीण अड़्गा प्रस्तार प्रस्तार मु़ञ्च।

Monday, April 18, 2011

हनुमान जयंती पर विशेष.....

बजरंगबली कलियुग के एकमात्र ऐसे देवता है जो बस क्षण भर में अपने भक्तों के सारे कष्टों को हर लेते है,बस दिल से एक बार सच्ची आवाज लगाने की आवश्यक्ता है।हनुमत महिमा का गुणगान हमारे सांसारिक और पारलौकिक हर पीड़ा का निदान एक अद्भूत राम बाण सा है।मर्यादा पुरुषोतम श्रीराम के परम प्रिय श्री हनुमान सच में अलौकिक और स्नेह सुधा प्रदान करने वाले है।मेरी अनुभूति है,जब भी मैने अपने जीवन के सर्वाधिक कठिन पलों में बजरंगबली को आवाज लगाया है,वो बस पवनवेग से आये है और सारी मुसीबतों और कष्टों को उड़ाकर मेरी जिंदगी से कही दूर फेंक दिया है।सभी देवी,देवताओं के प्रिय हमारे हनुमान जी बस भावना के भूखे है।वे सभी बौद्धिक कलाओं से युक्त ज्योतिष और संगीत के महाज्ञाता है।इस कलियुग की भीषण त्रासदी में एकमात्र हनुमत मंत्र हर बाधाओं को दूर करने वाला है।सभी कार्यों को सिद्ध कर के हमें जीवन में एक प्रतिष्ठित स्थान दिलाने वाला है।
आज "हनुमान जयंती" के शुभ अवसर पर सर्वप्रथम मै सभी को बहुत सारी बधाईयाँ देना चाहता हूँ,तथा साथ ही आज की जाने वाली पूजा का संक्षिप्त विवरण भी दे रहा हूँ।

आज की पूजाः-
"यदि घर में पूजा स्थान हो,तो हनुमत प्रतिमा के समक्ष या सार्वजनिक मंदिर में जाकर चमेली के तेल का उपयोग कर इक्कीस,एकयावन या एक सौ आठ दीपों की दीपमाला भगवान के समक्ष अर्पण करे।बहुत ही उपयोगी और कारगर पद्धति है,ये मनवांछित फल बिन माँगे ही पा लेंगे..."


अभी कुछ दिनों से मेरे ब्लाग "ॐ शिव माँ" पर लगातार बहुत सी पोस्ट बस हनुमत महिमा और मंत्र प्रयोग पर छपती आयी है,मै उनका लिंक नीचे दे रहा हूँ।आप सब इस ज्ञानमयी आलेखों का श्रवन करे लाभ मिलेगा।

1.)॥ श्री बजरंग बाण ॥


2.)संकटमोचन हनुमानाष्टक


3.)श्री हनुमत महिमा


4.)श्री हनुमत शक्ति मंत्र प्रयोग

"हनुमान जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं"

Tuesday, April 5, 2011

॥ श्री बजरंग बाण ॥

श्री हनुमान जी का बजरंग बाण जो प्रचलित है,उसका प्रभाव तो है ही परन्तु यह बजरंग बाण तांत्रोक्त प्रभाव वाला है।सारे अशुभ ग्रह,शत्रु,अवरोध का शमन बजरंग बाण पाठ से होता है।भूत,पिशाच,तंत्र बाधा,डाईन,मूठ,मारण या आसुरी शक्तियों का कोप इस सारे संकट से हनुमान जी मुक्त करते है।बजरंग बाण का पाठ करते समय अपने दायें हनुमत मूर्ति या चित्र के सामने एक लाल वस्त्र आसन के लिए रख ले ।  बजरंग बाण के हनुमान जी महामृत्युजय के साथ पंचमुख,सप्तमुख,एकादशमुख रूप धारण करके अकाल मृत्यु से रक्षा तो करते ही है साथ ही यम,काल को दूर भगाकर प्राणों की रक्षा करते है।पाठ से पहले गुरु,गणेश का पूजन कर पाठ करना चाहिए साथ ही तुलसी बाबा के साथ सीताराम जी का ध्यान कर हनुमान जी का निम्न ध्यान कर पाठ करना चाहिए।
                                                       अब श्री बजरंग बाण का पाठ लिख रहा हुँ।कहा जाता है कि जब बजरंग बाण का पाठ किया जाता है,तो हनुमान जी पधार जाते है।आजीवका में बाधा हो, या कोइ भी संकट ,तंत्र,मंत्र,मूठ,या ग्रह दोष से,या भूत पिशाच,का प्रकोप इस सभी बाधा से हनुमान जी रक्षा करये है।आपको कोई रास्ता नहीं मिल रहा हो,तो एक दीपक जला कर  किशमिश,गुड़ का भोग लगाकर प्रथम गुरुदेव,तब श्री गणेश,कुलदेवता का पुजन कर,राम परिवार सहित तुलसीबाबा को प्रणाम कर श्री बजरंग बाण का एक या इच्छा अनुसार विषम संख्या में पाठ करे तो हनुमान जी सारे संकट दूर कर देंगे।गूगूल का आहुती देकर पाठ करे तो विशेष लाभ होगा।
           ध्यान -अतुलित बल धामं,हेमशैलाभ देहं,दनुज वन कृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
             सकल गुणनिधानं वानराणामधीशं,रघुपति प्रियभक्तं वातजातं नमामि॥
                                          
॥ श्री बजरंग बाण ॥
  ॥दोहा॥ 
निश्चय प्रेम प्रतिति ते,विनय करे सह मान,।तेहि के कारज सकल शुभ,सिद्ध करैं हनुमान॥
॥चौपाई॥
जय हनुमन्त!सन्त हितकारी।सुन लीजे प्रभु!विनय हमारी॥
जन के काज विलम्ब न कीजै।आतुर दौरि महा सुख दीजै॥
                                                       जैसे कूदि सिन्धु के पारा।सुरसा वदन पैठि विस्तारा॥
                                                       आगे जाय लंकिनी रोका।मारेहु लात गई सुर लोका॥
जाय विभीषण को सुख दीन्हा।सीता निरखि परम पद लीन्हा॥
बाग उजारि सिन्धु मँह बोरा।अति आतुर यम कातर तोरा॥
                            अक्षय कुमार मारि संहारा।लूम लपेट लंक को जारा॥
                       लाह समान लंक जरि गई।जै जै ध्वनि सुर पुर नभभई॥
अब विलम्ब केहि कारण स्वामी।कृपा करहु प्रभु!अन्तर्यामी॥
जय जय लखन प्राण के दाता।आतुर ह्वै दुख करहु निपाता॥
                  जै गिरधर!जै जै सुख सागर।सुर समूह समरथ भट नागर॥
                 ॐ हनु हनु हनु हनुमन्त हठीले।बैरिही मारु व्रज सम मिले॥
गदा बज्र लै बैरिहि मारौ।महा राज!निज दास उबारौ।
सुनि हँकार हुंकार दै धावौ।ब्रज गदा हनु! बिलम्ब न लावौ।
                 ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमन्त कपीसा।ॐ हुं हुं हुं हनु!अरि उर सीसा।
                       सत्य होहु हरि सपथ पाय कै।रामदूत!धरू मारू धाय कै।
 जय जय जय हनुमन्त अगाधा।दुख पावत जन केहि अपराधा।
 पूजा जप तप नेम अचारा।नहिं जानत कछु दास तुम्हारा।
                 वन उपवन जल थल गृह माहीं।तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं।
                      पाँव परौं कर जोरि मनावौं।अपने काज लागि गुण गावौं।
जै अंजनी कुमार!बलवन्ता।शंकर सुवन वीर हनुमन्ता।
वदन कराल!काल कुल घातक।राम सहाय!सदा प्रति पालक।
                      भूत प्रेत पिशाच निसाचर।अगिन बेताल काल मारी मर।
                     इन्हें मारु,तोहिं सपथ राम की।राखु नाथ मर्याद नाम की।
जनक सुता हरि दास कहावौ।ताकी सपथ विलम्ब न लावौ।
जय जय जय ध्वनि होत अकासा।सुमिरत होत दुसह दुख नासा।
चरन पकरि कर  जोरि मनावौं।एहि अवसर अब केहि गोहरावौं।
                      उठु उठु चलु तोहिं राम दोहाई।पाँय परौं कर जोरि मनाई।
ॐ चं चं चं चं चपल चलन्ता।ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमन्ता।
ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल।ॐ सं सं सहमि पराने खल दल।
                      अपने जन को तुरत उबारो।सुमिरत होत आंनद हमारो।
                      ताते बिनती करौं पुकारी।हरहु सकल दुख विपती हमारी।
परम प्रबल प्रभाव प्रभु तोरा।कस न हरहु अब संकट मोरा।
हे बजरंग!बाण सम धावौं।मेटि सकल दुख दरस दिखावौं।
                      हे कपि राज काज कब ऐहौ।अवसर चूकि अन्त पछतैहौ।
                     जन की लाज जात एहि बारा।धावहु हे कपि पवन कुमारा।
जयति जयति जय जय हनुमाना।जयति जयति गुन ज्ञान निधाना।
जयति जयति जय जय कपि राई।जयति जयति जय जय सुख दाई।
          जयति जयति जय राम पियारे।जयति जयति जय,सिया दुलारे।
      जयति जयति मुद मंगल दाता।जयति जयति त्रिभुवन विख्याता।
एहि प्रकार गावत गुण शेषा।पावत पार नहीं लव लेसा।
राम रूप सर्वत्र समाना।देखत रहत सदा हर्षाना।
               विधि सारदा सहित दिन राती।गावत कपि के गुन बहु भाँती।
               तुम सम नहीं जगत बलवाना।करि विचार देखउँ विधि नाना।
यह जिय जानि सरन हम आये।ताते विनय करौं मन लाये।
सुनि कपि आरत बचन हमारे।हरहु सकल दुख सोच हमारे।
                   एहि प्रकार विनती कपि केरी।जो जन करै,लहै सुख ढेरी।
                            याके पढ़त बीर हनुमाना।धावत बान तुल्य बलवाना।
मेटत आय दुख छिन माहीं।दै दर्शन रघुपति ढिंग जाहीं।
पाठ  करे बजरंग बाण की।हनुमत रक्षा करैं प्राण की।
                    डीठ मूठ टोनादिक नासैं।पर कृत यन्त्र मन्त्र नहिं त्रासै।
                             भैरवादि सुर करैं मिताई।आयसु मानि करैं सेवकाई।
प्रण करि पाठ करै मन लाई।अल्प मृत्यु ग्रह दोष नसाई।
आवृत ग्यारह प्रति दिन जापै।ताकी छाँह काल नहिं व्यापै।
                   दै गूगुल की धूप हमेशा।करै पाठ तन मिटै कलेशा।
                        यह बजरंग बाण जेहि मारै।ताहि कहौ,फिर कौन उबारै।
शत्रु समूह मिटै सब आपै।देखत ताहि सुरासुर काँपै।
तेज प्रताप बुद्धि अधिकाई।रहै सदा कपि राज सहाई।

॥दोहा॥
उर प्रतीति दृढ सरन हवै,पाठ करै धरि ध्यान।
बाधा सब हर करै,सब काज सफल हनुमान।
प्रेम प्रतीतिहि कपि भजे,सदा धरै उर ध्यान।
तेहि के कारज सकल सुभ,सिद्ध करैं हनुमान॥
…………….॥समाप्त॥……………..