"ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥"

Sunday, February 20, 2011

माँ तारा

त्रिताप का जो नाश करती है उसे तारा कहते है।विष का ताप हो,दरिद्र का ताप हो,भय का ताप हो,सभी ताप को तारा दूर कर जीव को स्वतंत्र बनाती है।रोग से शरीर जर्जर हो गया हो,पाप से जीव कष्ट भोग रहा हो,विष से जीव कष्ट भोग रहा हो,वह जैसे तारा तारा पुकारता है,तो ममतामयी तारा भक्त को त्रिताप से मुक्त कर देती है।तारा अपने शिव को अपने मस्तक पर विराजमान रखती है।ये जीव को कहती है,चिंता मत कर,चिता भूमि में जब मृत्यु वरण करोगे मै साथ रहूँगी,तुम्हारे पाप,तुम्हारे दोष इस सभी बंधन से मै मुक्त कर दुँगी।इनकी साधना से कवित्व शक्ति,ज्ञान का उदय होता है।

ये प्रेममयी बनाती है।ये स्वयं प्रेममयी है।ये भक्त को निखारती है,सँवारती है।बुध ने भी इनकी साधना की थी।ये कई रुपों से युक्त है।ये हमेशा यौवनमयी मंद मुस्कान बिखेरती रहती है।ये जीवन के उस सत्य को दिखाती है,जो कोई देखना नहीं चाहता।मृत्यु ही सत्य है,यह बतला कर आगाह करती है,कि अच्छे कर्म करो,सेवा भाव रखो,एकाकी बनो,ध्यान करो,कई जन्मों के त्रिताप से जीव को मुक्त कर मन का विसर्जन कराती है।तभी आत्मदर्शन हो पाता है,हम उस रहस्य को देख पाते है,समझ आती है और सत्य से हम परिचित हो जाते है।कालिका के पैर के निचे शिव है,परंतु तारा के मस्तक पे शिव बैठे है।कलियुग में वामाखेपा की इष्ट देवी ये ही माँ तारा थी।जीव इनकी साधना से भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त कर लेते है।इनकी साधना वाम मार्ग से हो,या दक्षिण मार्ग से,परंतु ये प्रेम की प्रकाष्टा है।ये अपने भक्त को अपने मस्तक पर भी बिठा कर रखती है,और कहती है,कि चिंता मत कर जब मै हूँ तो तुझे कुछ करने की जरुरत नहीं है।एक बार जब शिव समुद्र मंथन के विष को पी कर मदहोस हुए जा रहे थे,तो तारा ने उनके विष को खिंच लिया था।इसलिए तारा सब को तार देती है।

क्रमशः अगले पोस्ट में श्री महात्रिपुर सुंदरी के चरित्र पर प्रकाश डाला जायेगा....

1 comment:

सुशील बाकलीवाल said...

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