"ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥"

Sunday, February 27, 2011

श्री बगलामुखी (पीताम्बरा माई)

विश्व की रक्षा करने वाली हैं,साथ जीव की जो रक्षा करती हैं,वही बगलामुखी हैं।स्तम्भन शक्ति के साथ ये त्रिशक्ति भी हैं।अभाव को दूर कर,शत्रु से अपने भक्त की हमेशा जो रक्षा करती हैं।दुष्ट जन,ग्रह,भूत पिशाच सभी को ये तत्क्षण रोक देती हैं।आकाश को जो पी जाती हैं,ये विष्णु द्वारा उपासिता श्री महा त्रिपुर सुन्दरी हैं। 
ये पीत वस्त्र वाली,अमृत के सागर मे दिव्य रत्न जड़ित सिंहासन पर विराजमान हैं।ये शिव मृत्युञ्जय की शक्ति हैं।ये अपने भक्तों   के कष्ट पहुँचाने वाले को बाँध देती हैं,रोक देती है।ये उग्र शक्ति के साथ,बहुत भक्त वत्सला भी हैं,परम करूणा के साथ भक्त के प्रत्यक्ष या गुप्त शत्रु को रोक देती हैं।ये वैष्णवी शक्ति हैं,ये शीघ्र प्रभाव दिखाती है,इस लिए इन्हें सिद्ध विद्या भी कहा जाता हैं।गुरू,शिव जब कृपा करते है तो ही इनकी साधना करने का सौभाग्य प्राप्त हो पाता हैं।वाम,दक्षिण दोनो आचार से इनकी पूजा होती हैं परन्तु दक्षिण मार्ग से इनकी पूजा शीघ्र फलीभूत होती हैं।ये काली,श्यामा के ही सुन्दरी,ललिता की एक दिव्य मूर्ति हैं।इनकी उपासना में अनुशासन,शुद्धता,के साथ गुरू की कृपा ही सर्वोपरि हैं।इनकी उपासना से साधक त्रिकालदर्शी होकर भोग के साथ मोक्ष भी प्राप्त कर लेता है,इनके कई मंत्र के जप के बाद मूल मंत्र का जप किया जाता है,कवच,न्यास,स्तोत्र पाठ के साथ अर्चन भी किया जाता हैं,इनका ३६ अक्षर मंत्र ही मूल मंत्र कहलाता हैं।इनकी साधना के अंग पूजा में प्रथम गुरू,गणेश,गायत्री,शिव,वटुक के साथ विडालिका यक्षिणी,योगिनी का पूजा अनिवार्य माना जाता हैं।ये विश्व की वह शक्ति हैं,जिनके कृपा से,चराचर जगत स्थिर रहता हैं।
ये ब्रह्म विद्या है इनकी साधना में शुद्धता के साथ जप,ध्यान के साथ गुरू कृपा मुख्य हैं।इनके जप से कुन्डलिनी शक्ति जाग्रत हो जाती है,इनके साधक कोई भी आसुरी शक्ति एक साथ मिलकर भी परास्त नहीं कर सकता,ये अपने भक्तों की सदा रक्षा करती है।विश्व की सारी शक्ति मिलकर भी इनकी बराबरी नहीं कर सकते हैं।  कई जन्म के पुण्य प्रभाव से इनकी साधना करने का सौभाग्य प्राप्त होता हैं।पुस्तक से देखकर या कही से सुनकर इनका मंत्र जप करने से कभी कभी जीवन मे उपद्रव शुरू हो जाता है।इसलिए बिना गूरू कृपा के इनकी साधना करें।भारत में इनके मंदिर तो कितने है,परन्तु इनका विशेष साधना पीठ श्री पीताम्बरा पीठ,दतिया मध्य प्रदेश हैं।ये शुद्ध विद्या है,इनकी महिमा जगत में विख्यात हैं।इनकी कृपा से चराचर जगत वश में रहता है,इनकी साधना करने से ये अपने भक्त को सभी प्रकार से देखभाल करती है।ये परम दयामयी तथा करूणा रखती है।

Saturday, February 26, 2011

धूमावती

मोह का जो नाश करती है वही धूमावती है।विधवा रूप है इनका,ये अपने प्रिय पति शिव को ही निगल गई थी तो शिव धुंआ बन निकल गये तब से इनका यही रूप है और इनका प्रभाव जगत मे आया।शत्रु नाश,देश पर संकट,ॠण,रोग सभी बाधा से मुक्त करती है।विजय प्राप्ति,भयंकर उपद्रव मे इनकी साधना शीघ्र लाभ देती है।इनकी साधना परम गोपनीय है,बिना गुरु मार्ग दर्शन के बिना इनकी साधना भूल कर भी नही करना चाहिए।ये बहुत उग्र भी है वही ये हमेशा दया भी रखती है।ये हमेशा भूखी रहती है परन्तु अपने भक्तों का सदा ध्यान भी रखती है।कोई ऐसा संकट जो दूर नही हो रहा हो सब उपाय करके देख लिया गया हो परन्तु इनकी साधना से यह तत्क्षण सारे संकट दूर कर देती है।
 इन्हे अपने भक्तों का दुख देखा नही जाता कारण किसी न किसी मोह मे हम बँधे है उस मोह से ये छुटकारा दिला देती है।जब मोह समाप्त होता है तो सत्य और वैराग्य का उदय होता है।१९६१-‍‌‌‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍६२ चीन के युद्ध मे जब स्थिति विकट हो गई तो भारत के प्रधानमंत्री श्री नेहरू जी ने परम सिद्ध राष्ट्र गुरु श्री स्वामी जी महाराज दतिया श्री पीताम्बरा पीठ के पास जाकर इस समस्या को रखे की बड़ी मुश्किल के बाद भारत आजाद हुआ था अब क्या होगा।तब श्री स्वामी जी ने दया करके उस राष्ट्र हित के लिए श्री बगलामुखी तथा इन्हीं माता धूमावती का दिव्य अनुष्ठान कराया था और इस अनुष्ठान के अंतिम रात्री साक्षात माता धूमावती ने आश्चर्यजनक रूप से युद्ध बंद करा दिया था,ऐसी इनकी महिमा है।युद्ध के बाद श्री स्वामी ने भक्तो के कल्याण के लिए श्री पीताम्बरा पीठ मे इनकी भी स्थापना करा कर भक्तों के लिए इनका दर्शन सुलभ बना दिया।इस प्रयोग के बाद भारत एक बार फिर इस संकट से बाहर हो गया।ये माता दशमहाविद्या मे परम गोपनीय है।

Thursday, February 24, 2011

छिन्नमस्ता

इनका क्या कहना,ये दया की,ममता की पराकाष्ठा है।अपने भक्त,अपने स्वजन के लिए ये क्या नही करती है।जो माया को छिन्न कर जो जीव को अष्टपाश से मुक्त करती है,वही छिन्नमस्ता है।जीव माया से बँधकर नाना प्रकार के कष्ट भोगता है।तंत्र का मंत्र का कोई भीषण प्रयोग करा दिया हो,डाईन,भूतनी लग गया हो,हर तरफ से संकट उपस्थित हो गया हो,ग्रह बाधा या कोई भी दुष्ट प्रभाव हो वह भी इनकी साधना से तत्क्षण दूर हो जाता है।यह लेख यहाँ तक दिनांक ०१‍।०७।२०१० को रात्री मे लिखा और सोचा बाद मे पूर्ण करूँगा,दो तारीख को व्यस्तता रही,०३।०७।२०१० को न्यूज पेपर मे पढ़ा कि रजरप्पा माता छिन्नमस्ता का मूर्ति खंडित कर माता का आँख और आभूषण दुष्टों ने चोरी कर लिया।इतने बड़े असुर बच नही सकते उन्हें पीढ़ी दर पीढ़ी विनाश को प्राप्त होना है। 
हे माता तेरी इच्छा के बिना इस सृष्टि मे एक तिनका तक नही हिल सकता परन्तु तुम तो ममता की ऐसी देवी हो की जब तुम्हारी सखी जया,विजया जब भूख से व्याकुल होकर तुम्हे पुकारने लगी की माता बड़ी भूख लगी है तो तुने उनकी पीड़ा से करूणा करके अपना ही सिर धड़ से अलग कर अपने रक्त धारा से स्वयं अपनी और उनकी तीन धाराओं से उनकी भूख मिटाई।माता के गर्भ मे रक्त से ही शिशु का विकास होता है,तुने तो अपने भक्तों के लिए खुद को बलिदान कर दिया,अब बताओ सृष्टि मे कौन है,जो तेरी जैसी ममतामयी करूणा रखने वाली है।चारों तरफ सब रोते है,तड़पते है कारण सभी माया से वशीभूत है,अज्ञान का पर्दा पड़ा है उस माया को छिन्न कर देती हो ... माँ तुम धन्य हो,तु भक्तों के लिए कितना कष्ट सहती हो,जीव को माया से मुक्त कर देती हो।स्वार्थ,लोलुपता वश लोग साधना कम करते है दिखावा अधिक,पाखंड,भेदभाव बढ़ गया है,साधना क्षेत्र के बिहंगम दुर्लभ प्रयोग कम हो गया है,साधक,सिद्ध,परम भक्त की जब कमी हो जाती है तो माता भी मुख मोड़ लेती है।छिन्नमस्ता का एक भी सिद्ध साधक माता के समीप हो तो क्या मजाल जो ये असुर,दुष्ट आँख उठा कर देख सके।हिन्दु धर्म मे जो पतन हो रहा है उसका कारण साधना क्षेत्र मे एकजुट और अति गंभीर साधक की कमी है।हम जबतक शक्ति के व्यापक विशेष प्रभाव को नही समझेंगे तो क्या होगा।श्री रामकृष्ण को दक्षिणेश्वर से निकाल दिया गया,वामाखेपा को अपमान सहना पड़ा,काशी विश्वनाथ के अवतार राष्ट्र गुरु श्री स्वामी, (दतिया) ने भी अपमान सहा।श्री करपात्री जी,काली साधक गुरु श्री सीताराम जी को भी लोगो का विष पीना पड़ा,परन्तु माता के ये सभी बहुत दुलारे,परम सिद्ध भक्त थे।छिन्नमस्ता को अगर कोई दिल से पुकारे तो वो ममतामयी दौड़ ही पड़ती है,अपना सब कुछ लूटा देती है अपने भक्तों के लिए।मै प्रार्थना पूर्वक यह कहना चाहता हूँ की भारत के सभी तीर्थ स्थल,शक्ति केन्द्र,प्राचीन मंदिर मे विशेष सुरक्षा की जरूरत है साथ ही दुर्लभ साधनायें भेद भाव रहित हर जाति के लोग जो योग्य है वो आगे बढ़े।इस सभी स्थल पर भेद भाव रहित दर्शन कराने की जरूरत है।जब माता ही भेद भाव नही करती तो ये कौन होते है नियम बनाने वाले,इन्हे सिर्फ अनुशासित होकर अपना कार्य करना चाहिए।साधको की गोष्टी,एक दूसरे की सहमति प्रेम पूर्ण ढ़ँग से आगे बढ़ना चाहिए।माता की लीला माँ ही जाने,उनका स्वभाव है अति उग्र परन्तु वह अति ममतामयी,दयामयी करूणा बरसाती रहती है।ये प्रेम की,बलिदान की पराकाष्टा है।ये सभी को देती है किसी को निराश नही करती ये तो अपने रक्त से भी भक्त की भूख मिटाने वाली है।ऐ माँ! इतनी ममता तु ही कर सकती है।कृष्ण ने छिन्नमस्ता साधना के द्वारा ही एक साथ कई रूप प्रकट कर लेते थे।इनकी साधना से पूर्ण संकटो से छूटकारा मिलता है।

Wednesday, February 23, 2011

भैरवी

भैरवी

भव का जो कारण है,वही भैरवी है।ये रक्षिका के साथ जीव का परम हितैषी है।जीवन में कहा चूक हो गई तथा आसुरी शक्ति का दमन हो,सदमार्ग पर कैसे चला जाये,ये जाँचती है,परखती है,साधक को उचित मार्ग पर चलाती भी है।भरण पोषण के साथ,संकट से परे रख कर साधक को साधना मार्ग पर आगे बढ़ाती है।
भय से मुक्त कर के भव बंधन से मुक्त कराती है।इस सृष्टि में हमेशा जीव के उद्धार के लिए क्रियाशील रहती है।गोपणीय मार्ग से आश्चर्यजनक रुप से अपने साधक का मार्ग प्रशस्त करती है।साधक के विकट समस्या का भी निदान करती है।इनकी साधना से जीव को ज्ञान के साथ भाव प्रकट हो जाता है।ये साधक के हर स्थिती में सहायक होती है,ताकि श्रद्धा,विश्वास टुटने ना पाये।ये ऐसी लीला रचा देती है,साधक को स्वप्न लोक में,ध्यान में कई दिव्य अनुभूति कराती रहती है,और उसी अनुभूति के साथ साधक आगे बढ़ जाता है।ये साधक के उदर पालन के साथ उसकी रक्षा भी करती है,ताकि कोई दुष्ट शक्तियाँ साधक के समक्ष अवरोध ना खड़ा करे।ये प्यारी माँ है,इनकी आँखों से हमेशा करुणा बरसती रहती है।इन्हे "त्रिपुरा भैरवी" भी कहा जाता है।

क्रमशः अगले पोस्ट में माँ छिन्नमस्तका की महता पर प्रकाश डाला जायेगा...

Tuesday, February 22, 2011

भुवनेश्वरी

भुवनेश्वरी:-

विश्व भुवन की जो,ईश्वरी हैं,वही भुवनेश्वरी हैं।समस्त भुवन में जो भी हैं,उसकी स्वामिनी हैं।इनका वर्ण श्याम तथा गौर वर्ण हैं।इनके लोक में पुरुष भी जाकर ,स्त्री बन जाते हैं।इनका भुवन अति सुन्दर हैं।नवरत्न जड़ित खम्बे इनकी जैसी सुन्दर इनकी नित्यायें,महा ऐश्वर्य,परम शांत,महामयी भक्तों पर शीघ्र प्रसन्न होने वाली इनकी सुन्दर चरण की छोटी नख में ब्रह्माण्ड का दर्शन होता हैं।
इनकी आज्ञा से जगत  का सारा संचालन होता हैं। ये जीव की सभी इच्छा पूर्ण करती हैं। इनके बीज मंत्र से ही सारी सृष्टि की रचना हुई हैं।इन्हें राज राजेश्वरी पराम्बा भी कहा जाता हैं।शाक्त धर्म में बिना इनके मंत्र शक्ति से आगे बढ़ना कठिन है्।इनके बीज मंत्र सभी देवी देवता की आराधना में विशेष शक्ति दायक माना जाता हैं। इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है,कि ये सौम्य तथा दया करने वाली हैं।ये सभी का पालन करती हैं,तथा इनकी कृपा तो भक्त को उस दिव्य दर्शन की अनुभूति हमेशा आनन्द में स्थिर रहने की कला प्रदान करती हैं।


क्रमशः अगले पोस्ट में माँ भैरवी का रुप वर्णन किया जायेगा....