"ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥"

Tuesday, May 17, 2011

श्री स्वामी


                                                 राष्ट्र गुरु "श्री स्वामी जी" गुरुदेव .....

सारा जीव अपने कर्मो का आदान प्रदान ही तो कर रहा है।कोई किसी का बात मानते नही कारण सभी अपने हिसाब से ज्ञानी है,इस सृष्टि मे गुरू तत्व ही है जो हमें इस कर्म जाल से मुक्त करते है और वह गुरू तत्व परम शिव तत्व है।शिव से बड़ा कोई किसी का शुभ चिन्तक हो नही सकता।शिव ही अनेक रूप घारण कर हमे शांति प्रदान करता है।शिव ही शक्ति है,शिव ही विष्णु है,शिव ही हनुमान है,शिव ही साक्षात परम ब्रह्म जगत गुरू है।जब हमारे गुरू श्री स्वामी जी महराज दतिया मे विराज रहे थे तो तीन विदेशी धर्माचार्य भारत भ्रमण करते हुए दतिया आ पहुँचे।सन्त फ्रांसिस,सन्त जोजिफ,और सन्त पीटर ये श्री स्वामी का नाम सुनकर आए हुए थे।अनेक लोगो ने श्री स्वामी की दिव्यता,साधना एवं विद्वता का गुणगान किया तभी वे तीनो सन्त दतिया पधारे थे।श्री स्वामी तो साक्षात शिव है,उन्हें क्या पता नही हैं।उस समय गुरूदेव आश्रम के प्रांगण में सैंभल के एक वृक्ष के नीचे विराजे थे।श्री स्वामी को उन्होंने अभिवादन किया और फिर बैठ गये।वे सन्त टूटी फूटी हिन्दी भी बोलते थे।बड़े जिज्ञासु भाव से उन विदेशी धर्माचार्यो ने कहा कि "हे सन्त शिरोमणि! मनुष्य ईश्वर से मिलने के लिए बहुत से प्रयत्न करता है और फिर खुद उससे मिलने जाता है,हम जानना चाहते हैं कि क्या कभी ईश्वर भी मनुष्य से मिलने के लिए आता है।उस सन्त का वचन सुनकर श्री स्वामी मुस्कराए और कहने लगे,हे ईश्वर को चाहने वाले बन्दो! ईश्वर मनुष्यों से मिलने के लिए हमारें देश में तो आता है,लेकिन तुम्हारे देश में आता है या नही,तुम लोग अनुसंधान करो।श्री स्वामी का यह वचन सुन वे फिर बोले क्या आपने कभी ईश्वर को देखा है?श्री गुरूदेव ने करूणा से उन सन्तो को देख कहा मैंने तो ईश्वर को नहीं देखा है लेकिन क्या तुमने भी कभी अपने प्रभु यीशु को देखा हैं।वे विदेशी साधु कहने लगे॓,नहीं हमने भी नही देखा है।तब प्रभु श्री स्वामी ने कहा यदि पुत्र होता है तो उसका पिता भी होता है।जिस काया का पुत्र होता है।उसी काया का बाप होना आवश्यक है अन्थया पिता नही माना जा सकता।रात्रि के समय अपने प्रभु यीशु से पूछना कि आपका पिता कौन है और हमें उनके दर्शन कराओ।गुरूदेव का यह वचन सुन वे तीनों विदेशी साधु राजकीय विश्राम गृह चले गए।रात्रि में सोने से पहले उन तीनों नें अपने प्रभु यीशु से उसी प्रकार प्रार्थना की और अलग अलग कमरे में सो गयें।रात्रि में तीनों साधुओं ने एक ही से स्वप्न देखे।उन्होनें देखा कि यीशु उनके पास आए और उनसे कहने लगे कि मेरे पिता वे ही हैं जिनके तुमने दिन  में दर्शन किये थे।यीशु ने श्री स्वामी जी का एक चित्र भी उन साधुओं को दिखाया।सूर्योदय से पहले ही वे तीनो विदेशी सन्त आश्रम पहुँच गए और बरामदे में विराजे परमात्मा सदाशिव श्री स्वामीजी को साष्टांग नमन कर कहने लगे हे जगतगुरू परमपिता हमने यीशु के पिता को देख लिया है और यह भी जान गए हैं कि ईश्वर मनुष्य से मिलने के लिए स्वयं भी आता है।भारत आने का उदेश्य हमारा पूरा हो गया,अब हम अपने देश चले जायेगे।श्री हनुमान जी की बचपन से की साधना ही हमै आगे बढाया।२० वर्ष बित जाने पर गुरू के लिए जो व्याकुलता हमे किन किन संतो,साधको के पास नही ले गया परन्तु कही चैन नही मिला।कारण बचपन से हममे एक लक्षण रहा कि कोई गलत चीज हमे शूट ही नही करता चाहे वह खानपान हो या और कोई चीज।बड़े बड़े साधको के पास जा कर भी भरोसा नही हो पाया तभी हनुमान जी ने स्वप्न में कुछ गोपनीय बात बताया।मैने शिव का ध्यान कर एक मंत्र का जप शुरू किया और इस संकल्प के साथ कि या गुरू मिलेगे या जान दूंगा दो रोज बिना खाए,पिए जप के साथ रोता रहा तभी गहरे ध्यान या नींद में शिव का दर्शन हुआ तथा जीवन के भविष्य के बारे मे ज्ञात हुआ।वचपन से कितने दिव्य स्वप्न आते रहे थे,उसका रहस्य पता चला।इस स्वप्न के बाद करीब चार माह बाद मेरे ज्योतिष गुरू श्री दुर्गा प्रसाद जी ने अचानक एक दिन एक परम साधक श्री सीताराम जी औघड़,काली भक्त से मिलवाये।वे दिव्य विभूति सफेद वस्त्र मे एक रक्तवर्ण दुपट्टा धारण किए, वे मुझे देख हंसने लगे और कहा कि काली साधना करना है वही जगदम्बा तुम्हे सब कुछ दे सकती है।काली से मुझे भय लगता था,लेकिन एक दिन गुरू कृपा ही रहा की मै आगे बढता गया।नौ वर्ष गुरू जी के मार्गदर्शन मे कठोर साधना करता रहा,गुरू जी वाममार्गी साधक थे एक दिन उन्होने कहा मांस मदिरा ले तभी माँ की कृपा प्राप्त होगी,कारण गुरू जी के अधिकतर शिष्य जो न जाने क्यों मुझसे घृणा ही करते थे मैं उनके नजर मे पांखडी तथा अंहकारी था कारण मैं बहुत अनुशासन मे रहने वाला रहा हूँ।मेरे माँ,पिता की मृत्यु को गुरू कृपा से उबर गया लेकिन गुरू मेरे अंनत गहराईयो मे विराजमान थे।उस गुरू सानिध्य में माँ का दिव्य पूजन तथा रात्रि में शिवाभोग,भैरवभोग तो अति रहस्यमय था।जब मांस मदिरा की बात चली तो मैने गुरू देव से कहा हे गुरूदेव मैने संकल्प लिया था कि जीवन मे कभी यह आचार न करूगाँ,परन्तु आप का आदेश सिर आँखो पर तो गुरू देव जोर से हँसने लगे और कहाँ मै तो परिक्षा ले रहा था,माता का आदेश है कि तुम दक्षिण मार्गी ही रहोगे।                

साधक सीताराम जी
                                                                                     साधक श्री विष्णुकान्त मुरिया जी


बहुत सारा वह यादे अभी भी भावविभोर कर देता हैं।उस समय स्वप्न मे श्री स्वामी दिखाई देते थे,परन्तु मैं नही जान पाता कि ये कौन है,लेकिन कभी कभी लगता था कि ये शिव है।काली की साधना और दिव्य दर्शन के बाद यह पता चला कि काली परम दयालु,करूणामयी है,तथा वे भक्त के भाव देखती है,वे परम प्रेममयी है।औघड़ गुरूजी के समाधि एक वर्ष पूर्व मुझे माँ ने वह रहस्य दिखा दिया।उसी समय श्री स्वामी ने दर्शन दिया और कुछ गोपनीय रहस्य से परिचित कराया।मुझे पता चला कि गुरू जी समाधि लेंगे और मुझे अब शिव श्री स्वामी के पास जाना है,उस समय मुझे पता चल गया था,कि जिन्हे मैं स्वप्न मे देखता रहा हूँ वो श्रीस्वामी श्री पिताम्बरा पीठ,दतिया के राष्टगुरू जो काशी विश्वनाथ जी के अवतार लेकर दतिया में बैठे है।जीवन में इतना रहस्य देखा हूँ कि अगर लिखूँ तो एक ग्रंथ बन जायेगा।शिव से शूरू करके साधना करते हुए अंत में स्वामी के चरणों मे अंतिम विश्राम तथा पुर्ण समर्पण अब स्वामी है,जैसा करे,अब वही शिव है वही माँ पीताम्बरा।काली माता ने श्री चरणों मै ला दिया।अब दतिया हमेशा आता रहा परन्तु अज्ञानता वश मेरी दीक्षा नही हो पा रही थी।श्री स्वामी अमृतेश्वर शिव के रूप मे विराजे है।श्री स्वामी ने कई बार मुझे कुछ रहस्य से परिचित कराया तथा कुछ ऐसा लीला रचे कि शारदीय नवरात्र में जाना पड़ा।वहाँ जाने पर पता चला कि कई साधक कई वर्षो से दीक्षा के लिए आए है,परन्तु दीक्षा नही मिलेगा ,कारण दीक्षा मे समय लगेगा,हो सकता है एकाध वर्ष,मैं तो घबड़ा गया और श्री स्वामी के अमृतेश्वर लिंग के पास जाकर कहा कि हे गुरूदेव आपने ही बुला लिया तो ये कैसी लीला है आपका तभी एक आदमी पिछे की ओर से कुछ बोला।मैं पिछे देखा कोई साधक थे ,बोले क्या कोई दिक्कत है मैंने कहा दीक्षा लेना था,उसपर वे बोले कि आप श्री विष्णुकान्त मुरिया जी से मिलिए,वही उपदेशक है,श्रीगुरू जी के प्रिय शिष्य तथा बहुत बड़े साधक के साथ दयालु है,और गुरू चरण पादुका के समक्ष गुरूकृपा से यही दीक्षा देते है।यहाँ जो होता है श्री स्वामी की इच्छा से होता है,और गुरूदेव ने बुलाया है तो दीक्षा अवश्य मिलेगा ऐसा मेरा विश्वास था।मै प्रथम बार श्री मुरिया जी के पास गया,एक दिव्य व्यक्तित्व रक्त परिधान मे एक गौरवर्ण को देख मैने कहा कि मुझे दीक्षा चाहिए तो मेरा नाम पूछा,और गम्भीर मुद्रा मे कहा मिल जायेगा आज ही,स्वयं उन्होने सारी प्रक्रिया पूर्ण करवा कर बोले कि तीन बजे दीक्षा के लिए आ जाए।मैं समय के पूर्व ही पधार गया ,नियत समय पर दीक्षा हुआ,वह क्षण लगा जैसे स्वामी चरण पादुका पर विराजमान मंद मंद मुस्कुरा रहे है,मै थोड़े पल के लिए चेतना शून्य हो गया।जप शूरू करने से पुरे नवरात्र कितने दिव्य अनुभव हुए जैसे जन्म जन्म की मुराद पूरी हुई हो।श्री विष्णुकान्त मुरिया जी परम साधक के साथ एक विशिष्ट ज्योतिष भी है,तथा इतने दयालु है की आज भी उनके मार्गदर्शन से आगे बढ रहा हूँ।हमेशा इन्होने मुझपर अपनी दया दृष्टि रख साधना के गोपनीय मर्म समझा कर मुझे आगे बढाते रहे है।मेरे इस लेख को पढने वाले को मै जरूर कहूँगा कि एक बार श्री पीताम्बरा पीठ जाकर श्री पीताम्बरा माई के साथ श्री स्वामी का दर्शन करे,तथा वहाँ श्री धूमावती माई,महाकाल भौरव,श्री बटुक भौरव,श्री गणेश जी,श्री हनुमान जी,हरिद्रा सरोवर के साथ श्री स्वामी मंदिरम् का दर्शन करे,वही अमृतेश्वर महादेव मे साक्षात श्री स्वामी जी महराज विराज रहे है।यहाँ पर प्राचीन वण्खण्डेश्वर शिव मंदिर भी साक्षात जाग्रत शिव है जो भीम के द्वारा प्रतीष्ठित है,यह अश्वथामा की साधना स्थली रही है साथ मे श्री परशुराम जी का दर्शन भी करे।श्री माँ त्रिपुर सुन्दरी का मंदिर भी है परन्तु वहाँ दर्शन करना संभव नही है।भारत का ऐसा दिव्य शक्ति पीठ जो आज कही ऐसा दिखाई नही देता,जाए तो श्री विष्णुकान्त मुरिया जी जैसे अलौकिक,साधक से मिल आपको आत्मिक शांति मिलेगा।मैने इनका विशाल हृद्वय देखा है,तथा ये कितने विलक्षण पूरूष है शायद मै समझ नही पाता हूँ,कोइ भी समस्या हो शीघ्र समाधान बता देते है।जब गुरू कृपा होती है,तो जीवन के परम सत्य दिखाई देने लगता है।यह गुरू कृपा ही है कि मै स्वामी चरण रज की धूली लगा पाया।नाना पंथ जगत के निज निज गुण गावै।सबका सार बता कर गुरू मारग लावै।मन ही बंधन है,आत्मा की बात करने से कुछ नही होगा,गुरू ही सब कर्ता है,जो जैसा पात्र होगा उस समय गुरू की कृपा मिल ही जाती है।यह स्थान झाँसी के पास है।जीवन मे जब कोई निशचल मन से साधना पर चल पड़े तो स्वामी कृपा करते ही है।

Sunday, May 1, 2011

मंत्र प्रयोग



गृह रक्षा- गाय का गोबर या लाल रंग का घोल लेकर उक्त मंत्र से १०८बार पढ़कर अभिमंत्रित कर लें फिर इसी मंत्र को पढ़ते हुए घर के चारों ओर रेखा खींच दें।ऐसा कर देने से घर में भूत,पिशाच,चोर डाकू के घुसने का भय नहीं रहता।साथ ही हिंसक जंतु,अग्नि भय से भी सुरक्षित रहा जा सकता हैं।
मंत्र- ॐ ह्रीं चण्डे!चामुण्डे भ्रुकुटि अट्टा ट्टे,भीम दर्शने!रक्ष रक्ष चौरेभ्यःवज्रेभ्यःअग्निभ्यःश्वापदेभ्यःदुष्टजनेभ्यःसर्वेभ्यःसर्वौपद्रवेभ्यःगण्डीःह्रीं ह्रीं ठःठः।


टोना टोटका तंत्र बाधा निवारण मंत्र- आज यह भी देखने को मिलता है कि कुछ दुष्ट लोग किसी टोना करने वाले से कोई प्रयोग करा देते है और लोग भयानक कष्ट भोगने लगते है।
दवा करने पर भी लाभ नहीं मिलता है,तब इस मंत्र को ११ माला से सिद्ध कर प्रयोग करे।लोग जादू टोना से प्रभावित होकर विक्षिप्त भी हो जाते है।किसी शुभ मूर्हूत मे ईस मंत्र का प्रयोग करें।एक दीपक जलाकर किशमिश का भोग लगा कर मंत्र सिद्ध करे,फिर प्रयोग करते समय ७बार मंत्र पढ़ फूंक मारकर उतारा कर दें।ऐसा ७बार कर देने पर सभी जादू टोना नष्ट हो जाता हैं।बाद मे एक सफेद भोजपत्र पर अष्टगंध की स्याही से अनार के कलम से मंत्र लिख ताँबा या चाँदी की ताबीज मे यंत्र भरकर काला धागा लगाकर स्त्री हो तो बांया पुरूष हो तो दांये बांह मे ७बार मंत्र पढ़ बाँध ले।
शाबर मंत्र- ॐ नमो आदेश गुरू को।ॐ अपर केश विकट भेष।खम्भ प्रति पहलाद राखे,पाताल राखे पाँव।देवी जड़घा राखे,कालिका मस्तक रखें।महादेव जी कोई या पिण्ड प्राण को छोड़े,छेड़े तो देवक्षणा भूत प्रेत डाकिनी,शाकिनी गण्ड ताप तिजारी जूड़ी एक पहरूँ साँझ को सवाँरा को कीया को कराया को,उल्टा वाहि के पिण्ड पर पड़े।इस पिण्ड की रक्षा श्री नृसिंह जी करे।शब्द साँचा,पिण्ड काचा।फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा
गठिया रोग और वात वेदना-
गठिया या वात रोग से लोग बहुत प्रभावित होकर हमेशा दवा खाते रहते है,इस प्रयोग को करे,लाभ होगा।किसी पर्वकाल मे मंत्र को सिद्ध करे।बाद में सन्धि वात या गठिया,वात या कमर में बाई,वात बेदना वाले रोगी को मंगल या रवि को मोर पंख से २१ बार उक्त मंत्र पढ़कर झाड़े।११ माला जप कर मंत्र सिद्ध कर लें।
मंत्र- ॐ मूल नमःधुक्ष नमः।जाहि जाहि ध्वाक्ष तमःप्रर्कीण अड़्गा प्रस्तार प्रस्तार मु़ञ्च।

Monday, April 18, 2011

हनुमान जयंती पर विशेष.....

बजरंगबली कलियुग के एकमात्र ऐसे देवता है जो बस क्षण भर में अपने भक्तों के सारे कष्टों को हर लेते है,बस दिल से एक बार सच्ची आवाज लगाने की आवश्यक्ता है।हनुमत महिमा का गुणगान हमारे सांसारिक और पारलौकिक हर पीड़ा का निदान एक अद्भूत राम बाण सा है।मर्यादा पुरुषोतम श्रीराम के परम प्रिय श्री हनुमान सच में अलौकिक और स्नेह सुधा प्रदान करने वाले है।मेरी अनुभूति है,जब भी मैने अपने जीवन के सर्वाधिक कठिन पलों में बजरंगबली को आवाज लगाया है,वो बस पवनवेग से आये है और सारी मुसीबतों और कष्टों को उड़ाकर मेरी जिंदगी से कही दूर फेंक दिया है।सभी देवी,देवताओं के प्रिय हमारे हनुमान जी बस भावना के भूखे है।वे सभी बौद्धिक कलाओं से युक्त ज्योतिष और संगीत के महाज्ञाता है।इस कलियुग की भीषण त्रासदी में एकमात्र हनुमत मंत्र हर बाधाओं को दूर करने वाला है।सभी कार्यों को सिद्ध कर के हमें जीवन में एक प्रतिष्ठित स्थान दिलाने वाला है।
आज "हनुमान जयंती" के शुभ अवसर पर सर्वप्रथम मै सभी को बहुत सारी बधाईयाँ देना चाहता हूँ,तथा साथ ही आज की जाने वाली पूजा का संक्षिप्त विवरण भी दे रहा हूँ।

आज की पूजाः-
"यदि घर में पूजा स्थान हो,तो हनुमत प्रतिमा के समक्ष या सार्वजनिक मंदिर में जाकर चमेली के तेल का उपयोग कर इक्कीस,एकयावन या एक सौ आठ दीपों की दीपमाला भगवान के समक्ष अर्पण करे।बहुत ही उपयोगी और कारगर पद्धति है,ये मनवांछित फल बिन माँगे ही पा लेंगे..."


अभी कुछ दिनों से मेरे ब्लाग "ॐ शिव माँ" पर लगातार बहुत सी पोस्ट बस हनुमत महिमा और मंत्र प्रयोग पर छपती आयी है,मै उनका लिंक नीचे दे रहा हूँ।आप सब इस ज्ञानमयी आलेखों का श्रवन करे लाभ मिलेगा।

1.)॥ श्री बजरंग बाण ॥


2.)संकटमोचन हनुमानाष्टक


3.)श्री हनुमत महिमा


4.)श्री हनुमत शक्ति मंत्र प्रयोग

"हनुमान जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं"

Tuesday, April 5, 2011

॥ श्री बजरंग बाण ॥

श्री हनुमान जी का बजरंग बाण जो प्रचलित है,उसका प्रभाव तो है ही परन्तु यह बजरंग बाण तांत्रोक्त प्रभाव वाला है।सारे अशुभ ग्रह,शत्रु,अवरोध का शमन बजरंग बाण पाठ से होता है।भूत,पिशाच,तंत्र बाधा,डाईन,मूठ,मारण या आसुरी शक्तियों का कोप इस सारे संकट से हनुमान जी मुक्त करते है।बजरंग बाण का पाठ करते समय अपने दायें हनुमत मूर्ति या चित्र के सामने एक लाल वस्त्र आसन के लिए रख ले   बजरंग बाण के हनुमान जी महामृत्युजय के साथ पंचमुख,सप्तमुख,एकादशमुख रूप धारण करके अकाल मृत्यु से रक्षा तो करते ही है साथ ही यम,काल को दूर भगाकर प्राणों की रक्षा करते है।पाठ से पहले गुरु,गणेश का पूजन कर पाठ करना चाहिए साथ ही तुलसी बाबा के साथ सीताराम जी का ध्यान कर हनुमान जी का निम्न ध्यान कर पाठ करना चाहिए।
                                                       अब श्री बजरंग बाण का पाठ लिख रहा हुँ।कहा जाता है कि जब बजरंग बाण का पाठ किया जाता है,तो हनुमान जी पधार जाते है।आजीवका में बाधा हो, या कोइ भी संकट ,तंत्र,मंत्र,मूठ,या ग्रह दोष से,या भूत पिशाच,का प्रकोप इस सभी बाधा से हनुमान जी रक्षा करये है।आपको कोई रास्ता नहीं मिल रहा हो,तो एक दीपक जला कर  किशमिश,गुड़ का भोग लगाकर प्रथम गुरुदेव,तब श्री गणेश,कुलदेवता का पुजन कर,राम परिवार सहित तुलसीबाबा को प्रणाम कर श्री बजरंग बाण का एक या इच्छा अनुसार विषम संख्या में पाठ करे तो हनुमान जी सारे संकट दूर कर देंगे।गूगूल का आहुती देकर पाठ करे तो विशेष लाभ होगा।
           ध्यान -अतुलित बल धामं,हेमशैलाभ देहं,दनुज वन कृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
             सकल गुणनिधानं वानराणामधीशं,रघुपति प्रियभक्तं वातजातं नमामि॥
                                          
श्री बजरंग बाण
  ॥दोहा॥ 
निश्चय प्रेम प्रतिति ते,विनय करे सह मान,।तेहि के कारज सकल शुभ,सिद्ध करैं हनुमान॥
॥चौपाई॥
जय हनुमन्त!सन्त हितकारी।सुन लीजे प्रभु!विनय हमारी॥
जन के काज विलम्ब कीजै।आतुर दौरि महा सुख दीजै॥
                                                       जैसे कूदि सिन्धु के पारा।सुरसा वदन पैठि विस्तारा॥
                                                       आगे जाय लंकिनी रोका।मारेहु लात गई सुर लोका॥
जाय विभीषण को सुख दीन्हा।सीता निरखि परम पद लीन्हा॥
बाग उजारि सिन्धु मँह बोरा।अति आतुर यम कातर तोरा॥
                            अक्षय कुमार मारि संहारा।लूम लपेट लंक को जारा॥
                       लाह समान लंक जरि गई।जै जै ध्वनि सुर पुर नभभई॥
अब विलम्ब केहि कारण स्वामी।कृपा करहु प्रभु!अन्तर्यामी॥
जय जय लखन प्राण के दाता।आतुर ह्वै दुख करहु निपाता॥
                  जै गिरधर!जै जै सुख सागर।सुर समूह समरथ भट नागर॥
                  हनु हनु हनु हनुमन्त हठीले।बैरिही मारु व्रज सम मिले॥
गदा बज्र लै बैरिहि मारौ।महा राज!निज दास उबारौ।
सुनि हँकार हुंकार दै धावौ।ब्रज गदा हनु! बिलम्ब लावौ।
                  ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमन्त कपीसा।ॐ हुं हुं हुं हनु!अरि उर सीसा।
                       सत्य होहु हरि सपथ पाय कै।रामदूत!धरू मारू धाय कै।
 जय जय जय हनुमन्त अगाधा।दुख पावत जन केहि अपराधा।
 पूजा जप तप नेम अचारा।नहिं जानत कछु दास तुम्हारा।
                 वन उपवन जल थल गृह माहीं।तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं।
                      पाँव परौं कर जोरि मनावौं।अपने काज लागि गुण गावौं।
जै अंजनी कुमार!बलवन्ता।शंकर सुवन वीर हनुमन्ता।
वदन कराल!काल कुल घातक।राम सहाय!सदा प्रति पालक।
                      भूत प्रेत पिशाच निसाचर।अगिन बेताल काल मारी मर।
                     इन्हें मारु,तोहिं सपथ राम की।राखु नाथ मर्याद नाम की।
जनक सुता हरि दास कहावौ।ताकी सपथ विलम्ब लावौ।
जय जय जय ध्वनि होत अकासा।सुमिरत होत दुसह दुख नासा।
चरन पकरि कर  जोरि मनावौं।एहि अवसर अब केहि गोहरावौं।
                      उठु उठु चलु तोहिं राम दोहाई।पाँय परौं कर जोरि मनाई।
चं चं चं चं चपल चलन्ता।ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमन्ता।
हं हं हाँक देत कपि चंचल।ॐ सं सं सहमि पराने खल दल।
                      अपने जन को तुरत उबारो।सुमिरत होत आंनद हमारो।
                      ताते बिनती करौं पुकारी।हरहु सकल दुख विपती हमारी।
परम प्रबल प्रभाव प्रभु तोरा।कस हरहु अब संकट मोरा।
हे बजरंग!बाण सम धावौं।मेटि सकल दुख दरस दिखावौं।
                      हे कपि राज काज कब ऐहौ।अवसर चूकि अन्त पछतैहौ।
                     जन की लाज जात एहि बारा।धावहु हे कपि पवन कुमारा।
जयति जयति जय जय हनुमाना।जयति जयति गुन ज्ञान निधाना।
जयति जयति जय जय कपि राई।जयति जयति जय जय सुख दाई।
          जयति जयति जय राम पियारे।जयति जयति जय,सिया दुलारे।
      जयति जयति मुद मंगल दाता।जयति जयति त्रिभुवन विख्याता।
एहि प्रकार गावत गुण शेषा।पावत पार नहीं लव लेसा।
राम रूप सर्वत्र समाना।देखत रहत सदा हर्षाना।
               विधि सारदा सहित दिन राती।गावत कपि के गुन बहु भाँती।
               तुम सम नहीं जगत बलवाना।करि विचार देखउँ विधि नाना।
यह जिय जानि सरन हम आये।ताते विनय करौं मन लाये।
सुनि कपि आरत बचन हमारे।हरहु सकल दुख सोच हमारे।
                   एहि प्रकार विनती कपि केरी।जो जन करै,लहै सुख ढेरी।
                            याके पढ़त बीर हनुमाना।धावत बान तुल्य बलवाना।
मेटत आय दुख छिन माहीं।दै दर्शन रघुपति ढिंग जाहीं।
पाठ  करे बजरंग बाण की।हनुमत रक्षा करैं प्राण की।
                    डीठ मूठ टोनादिक नासैं।पर कृत यन्त्र मन्त्र नहिं त्रासै।
                             भैरवादि सुर करैं मिताई।आयसु मानि करैं सेवकाई।
प्रण करि पाठ करै मन लाई।अल्प मृत्यु ग्रह दोष नसाई।
आवृत ग्यारह प्रति दिन जापै।ताकी छाँह काल नहिं व्यापै।
                   दै गूगुल की धूप हमेशा।करै पाठ तन मिटै कलेशा।
                        यह बजरंग बाण जेहि मारै।ताहि कहौ,फिर कौन उबारै।
शत्रु समूह मिटै सब आपै।देखत ताहि सुरासुर काँपै।
तेज प्रताप बुद्धि अधिकाई।रहै सदा कपि राज सहाई।

॥दोहा॥
उर प्रतीति दृढ सरन हवै,पाठ करै धरि ध्यान।
बाधा सब हर करै,सब काज सफल हनुमान।
प्रेम प्रतीतिहि कपि भजे,सदा धरै उर ध्यान।
तेहि के कारज सकल सुभ,सिद्ध करैं हनुमान॥
…………….॥समाप्त॥……………..

Friday, April 1, 2011

संकटमोचन हनुमानाष्टक

बाल समय रबि भक्षि लियो तब,तीनहुँ लोक भयो अँधियारो।
ताहि सो त्रास भयो जग को,यह संकट काहुँ सो जात टारो।
देवन आनि करी बिनती तब,छाँड़ि दियो रवि कष्ट निवारो।
को नहिं जानत है जग मे कपि,संकट मोचन नाम तिहारो॥१॥
                                        
अर्थ- हे हनुमान जी! आप बालक थे तब आपने सूर्य को अपने मूख मे रख लिया जिससे तीनो लोकों मे अँधेरा हो गया। इससे संसार भर मे विपति छा गई,‌और उस संकत को कोई भी दूर नही कर सका।देवताओं ने आकर आपकी विनती की और आपने सूर्य को मुक्त कर दिया।इस प्रकार संकट दूर हुआ।हे हनुमान जी,संसार में ऐसा कौन है जो आपका संकट मोचन नाम नहीं जानता।

बालि की त्रास कपीस बसै गिरि,जात महा प्रभु पंथ निहारो।
चौंकि महामुनि साप दियो तब,चाहिए कौन बिचार बिचारो।
कै द्विज रुप लिवाय महाप्रभु सो तुम दास के सोक निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकट मोचन नाम तिहारो॥२॥

अर्थ- बालि के डर से सुग्रीव पर्वत पर रहते थे।उन्होनें श्री रामचन्द्र को आते देखा,उन्होनें आपको पता लगा के लिए भेजा।आपने अपना ब्राह्मण का रुप धर कर के श्री रामचन्द्र जी से भेंट की और उनको अपने साथ लिवा लाये,जिससे आपने सुग्रीव के शोक का निवारण किया।हे हनुमान जी,संसार मे ऐसा कौन है जो आपका संकट मोचन नाम नहीं जानता।

अंगद के संग लेन गए सिय,खोज कपीस यह बैन उचारो।
जीवत बचिहौ हम सों जु,बिना सुधि लाए इहाँ पगु धारो।
हेरि थके तट सिंधु सबै तब,लाए सिया सुधि प्रान उबारो।
को नही जानत है,जग मे कपि संकट मोचन नाम तिहारो॥३॥

अर्थ- सुग्रीव ने अंगद के साथ सीता जी की खोज के लिए अपनी सेना को भेजते समय कह दिया था कि यदि सीता जी का पता लगाकर नही लाए तो हम तुम सब को मार डालेंगे।सब ढ़ूँढ़ ढ़ूँढ़कर हार गये।तब आप समुद्र के तट से कूद कर सीता जी का पता लगाकर लाये,जिससे सबके प्राण बचे।हे हनुमान जी!संसार मे ऐेसा कौन है,जो आपका संकट मोचन नाम नही जानता।

रावण त्रास दई सिय को सब,राक्षसि सो कहि सोक निवारो।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु ,जाय महा रजनीचर मारो।
चाहत सिय अशोक सों आगि सु,दै प्रभु मुद्रिका शोक निवारो।
को नहीं जानत हैं,जग मे कपि संकट मोचन नाम तिहारो॥४॥
अर्थ- जब रावण ने श्री सीता जी को भय दिखाया और कष्ट दिया और सब राक्षसियों से कहा कि सीता जी को मनावें,हे महावीर हनुमान जी,उस समय आपने पहुँच कर महान राक्षसों को मारा।सीता जी ने अशोक वृक्ष से अग्नि माँगी परन्तु आपने उसी वृक्ष पर से श्री रामचन्द्र जी कि अँगूठी डाल दी जिससे सीता जी कि चिन्ता दूर हुई।हे हनुमान जी,संसार मे
ऐसा कौन है जो आपका संकट मोचन नाम नही जानता।
बान ल्गयो उर लक्षिमण के तब,प्राण तजे सुत रावन मारो।
लै गृह वैद्य सुषेन समेत,तबै गृह द्रोन सु बीर उपारो।
आनि सजीवन हाथ दई तब,लछिमन के तुम प्रान उबारो।
को नहिं जानत हैं जग मे कपि संकट मोचन नाम तिहारो॥५॥

अर्थ- रावन के पुत्र मेघनाद ने बान मारा जो लक्ष्मण जी की छाती पर लगा और उससे उनके प्राण संकट मे पड़ गए।तब आपही सुषेन वैद्य को घर सहित उठा लाए और द्रोणाचल पर्वत सहित संजीवनी बूटी ले आये जिससे लक्ष्मण जी के प्राण बच गये।हे हनुमान जी,संसार मे ऐसा कौन है जो आपका संकट मोचन नाम नही जानता।

रावन जुद्ध अजान कियो तब,नाग की फाँस सबै सिर डारो।
श्री रघुनाथ समेत सबै दल,मोह भयो यह संकट भारो।
आनि खगेस तबै हनुमान जु,बन्धन काटि सुत्रास निवारो।
को नहि जानत है जग मे कपि,संकट मोचन नाम तिहारो॥६॥

अर्थ- रावण ने घोर युद्ध करते हुए सबको नागपाश मे बाँध लिया तब श्री रघुनाथ सहित सारे दल मे यह मोह छा गया की यह तो बहुत भारी संकट है।उस समय,हे हनुमान जी आपने गरुड़ जी को लाकर बँधन को कटवा दिया जिससे संकट दूर हुआ।हे हनुमान जी,संसार मे ऐसा कौन है जो आपका संकट मोचन नाम नही जानता।

बधु समेत जबै अहिरावण,लै रघुनाथ पाताल सिधारो।
देविहिं पूजि भली विधि सों बलि,देउ सबै मिलि मंत्र बिचारो।
जाय सहाय भयो तब ही,अहिरावन सैन्य समेत संहारो।
को नहिं जानत है जग में कपि,संकट मोचन नाम तिहारो॥७॥
अर्थ- अब अहिरावन श्री रघुनाथ जी को लक्षमण सहित पाताल को ले गया,और भलिभांति देवि जी की पूजा करके सबके परामर्श से यह निशचय किया कि इन दोनों भाइयों की बलि दूंगा,उसी समय आपने वहाँ पहुंच कर अहिरावन को उसकी सेना समेत मार डाला। हे हनुमान जी,संसार मे ऐसा कौन है जो आपका संकट मोचन नाम नहीं जानता॥

काज किए बड़ देवन के तुम,बीर महाप्रभु बेखि बिचारो।
कौन सो संकट मोर गरीब को,जो तुमसो नहिं जात है टारो।
बेगि हरौ हनुमान महाप्रभु,जो कछु संकट होय हमारो।
को नहिं जानत है जग में कपि,संकटमोचन नाम तिहारो॥८॥
अर्थ- हे महाबीर! आपने बड़े बड़े देवों के कार्य संवारे है।अब आप देखिये और सोचीए कि मुझ दीन हीन का ऐसा कौन सा संकट है जिसको आप दुर नहीं कर सकते। हे महाबीर हनुमान जी,हमारा जो कुछ भी संकट हो आप उसे शीघ्र ही दूर कर दीजीए।हे हनुमान जी,संसार में ऐसा कौन है जो आपका संकट मोचन नाम नहीं जानता।
॥दोहा॥
लाल देह लाली लसे,अरु धरि लाल लंगूर।
बज्र देह दानव दलन,जय,जय जय कपि सूर॥
अर्थ- आपका शरीर लाल है,आपकी पूँछ लाल है और आपने लाल सिंदूर धारण कर रखा है,आपके वस्त्र भी लाल है।आपका शरीर बज्र है,और आप दुष्टों का नाश कर देते है।हे हनुमान जी!आपकी जय हो,जय हो,जय हो॥