"ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥"

Tuesday, May 17, 2011

श्री स्वामी


                                                 राष्ट्र गुरु "श्री स्वामी जी" गुरुदेव .....

सारा जीव अपने कर्मो का आदान प्रदान ही तो कर रहा है।कोई किसी का बात मानते नही कारण सभी अपने हिसाब से ज्ञानी है,इस सृष्टि मे गुरू तत्व ही है जो हमें इस कर्म जाल से मुक्त करते है और वह गुरू तत्व परम शिव तत्व है।शिव से बड़ा कोई किसी का शुभ चिन्तक हो नही सकता।शिव ही अनेक रूप घारण कर हमे शांति प्रदान करता है।शिव ही शक्ति है,शिव ही विष्णु है,शिव ही हनुमान है,शिव ही साक्षात परम ब्रह्म जगत गुरू है।जब हमारे गुरू श्री स्वामी जी महराज दतिया मे विराज रहे थे तो तीन विदेशी धर्माचार्य भारत भ्रमण करते हुए दतिया आ पहुँचे।सन्त फ्रांसिस,सन्त जोजिफ,और सन्त पीटर ये श्री स्वामी का नाम सुनकर आए हुए थे।अनेक लोगो ने श्री स्वामी की दिव्यता,साधना एवं विद्वता का गुणगान किया तभी वे तीनो सन्त दतिया पधारे थे।श्री स्वामी तो साक्षात शिव है,उन्हें क्या पता नही हैं।उस समय गुरूदेव आश्रम के प्रांगण में सैंभल के एक वृक्ष के नीचे विराजे थे।श्री स्वामी को उन्होंने अभिवादन किया और फिर बैठ गये।वे सन्त टूटी फूटी हिन्दी भी बोलते थे।बड़े जिज्ञासु भाव से उन विदेशी धर्माचार्यो ने कहा कि "हे सन्त शिरोमणि! मनुष्य ईश्वर से मिलने के लिए बहुत से प्रयत्न करता है और फिर खुद उससे मिलने जाता है,हम जानना चाहते हैं कि क्या कभी ईश्वर भी मनुष्य से मिलने के लिए आता है।उस सन्त का वचन सुनकर श्री स्वामी मुस्कराए और कहने लगे,हे ईश्वर को चाहने वाले बन्दो! ईश्वर मनुष्यों से मिलने के लिए हमारें देश में तो आता है,लेकिन तुम्हारे देश में आता है या नही,तुम लोग अनुसंधान करो।श्री स्वामी का यह वचन सुन वे फिर बोले क्या आपने कभी ईश्वर को देखा है?श्री गुरूदेव ने करूणा से उन सन्तो को देख कहा मैंने तो ईश्वर को नहीं देखा है लेकिन क्या तुमने भी कभी अपने प्रभु यीशु को देखा हैं।वे विदेशी साधु कहने लगे॓,नहीं हमने भी नही देखा है।तब प्रभु श्री स्वामी ने कहा यदि पुत्र होता है तो उसका पिता भी होता है।जिस काया का पुत्र होता है।उसी काया का बाप होना आवश्यक है अन्थया पिता नही माना जा सकता।रात्रि के समय अपने प्रभु यीशु से पूछना कि आपका पिता कौन है और हमें उनके दर्शन कराओ।गुरूदेव का यह वचन सुन वे तीनों विदेशी साधु राजकीय विश्राम गृह चले गए।रात्रि में सोने से पहले उन तीनों नें अपने प्रभु यीशु से उसी प्रकार प्रार्थना की और अलग अलग कमरे में सो गयें।रात्रि में तीनों साधुओं ने एक ही से स्वप्न देखे।उन्होनें देखा कि यीशु उनके पास आए और उनसे कहने लगे कि मेरे पिता वे ही हैं जिनके तुमने दिन  में दर्शन किये थे।यीशु ने श्री स्वामी जी का एक चित्र भी उन साधुओं को दिखाया।सूर्योदय से पहले ही वे तीनो विदेशी सन्त आश्रम पहुँच गए और बरामदे में विराजे परमात्मा सदाशिव श्री स्वामीजी को साष्टांग नमन कर कहने लगे हे जगतगुरू परमपिता हमने यीशु के पिता को देख लिया है और यह भी जान गए हैं कि ईश्वर मनुष्य से मिलने के लिए स्वयं भी आता है।भारत आने का उदेश्य हमारा पूरा हो गया,अब हम अपने देश चले जायेगे।श्री हनुमान जी की बचपन से की साधना ही हमै आगे बढाया।२० वर्ष बित जाने पर गुरू के लिए जो व्याकुलता हमे किन किन संतो,साधको के पास नही ले गया परन्तु कही चैन नही मिला।कारण बचपन से हममे एक लक्षण रहा कि कोई गलत चीज हमे शूट ही नही करता चाहे वह खानपान हो या और कोई चीज।बड़े बड़े साधको के पास जा कर भी भरोसा नही हो पाया तभी हनुमान जी ने स्वप्न में कुछ गोपनीय बात बताया।मैने शिव का ध्यान कर एक मंत्र का जप शुरू किया और इस संकल्प के साथ कि या गुरू मिलेगे या जान दूंगा दो रोज बिना खाए,पिए जप के साथ रोता रहा तभी गहरे ध्यान या नींद में शिव का दर्शन हुआ तथा जीवन के भविष्य के बारे मे ज्ञात हुआ।वचपन से कितने दिव्य स्वप्न आते रहे थे,उसका रहस्य पता चला।इस स्वप्न के बाद करीब चार माह बाद मेरे ज्योतिष गुरू श्री दुर्गा प्रसाद जी ने अचानक एक दिन एक परम साधक श्री सीताराम जी औघड़,काली भक्त से मिलवाये।वे दिव्य विभूति सफेद वस्त्र मे एक रक्तवर्ण दुपट्टा धारण किए, वे मुझे देख हंसने लगे और कहा कि काली साधना करना है वही जगदम्बा तुम्हे सब कुछ दे सकती है।काली से मुझे भय लगता था,लेकिन एक दिन गुरू कृपा ही रहा की मै आगे बढता गया।नौ वर्ष गुरू जी के मार्गदर्शन मे कठोर साधना करता रहा,गुरू जी वाममार्गी साधक थे एक दिन उन्होने कहा मांस मदिरा ले तभी माँ की कृपा प्राप्त होगी,कारण गुरू जी के अधिकतर शिष्य जो न जाने क्यों मुझसे घृणा ही करते थे मैं उनके नजर मे पांखडी तथा अंहकारी था कारण मैं बहुत अनुशासन मे रहने वाला रहा हूँ।मेरे माँ,पिता की मृत्यु को गुरू कृपा से उबर गया लेकिन गुरू मेरे अंनत गहराईयो मे विराजमान थे।उस गुरू सानिध्य में माँ का दिव्य पूजन तथा रात्रि में शिवाभोग,भैरवभोग तो अति रहस्यमय था।जब मांस मदिरा की बात चली तो मैने गुरू देव से कहा हे गुरूदेव मैने संकल्प लिया था कि जीवन मे कभी यह आचार न करूगाँ,परन्तु आप का आदेश सिर आँखो पर तो गुरू देव जोर से हँसने लगे और कहाँ मै तो परिक्षा ले रहा था,माता का आदेश है कि तुम दक्षिण मार्गी ही रहोगे।                

साधक सीताराम जी
                                                                                     साधक श्री विष्णुकान्त मुरिया जी


बहुत सारा वह यादे अभी भी भावविभोर कर देता हैं।उस समय स्वप्न मे श्री स्वामी दिखाई देते थे,परन्तु मैं नही जान पाता कि ये कौन है,लेकिन कभी कभी लगता था कि ये शिव है।काली की साधना और दिव्य दर्शन के बाद यह पता चला कि काली परम दयालु,करूणामयी है,तथा वे भक्त के भाव देखती है,वे परम प्रेममयी है।औघड़ गुरूजी के समाधि एक वर्ष पूर्व मुझे माँ ने वह रहस्य दिखा दिया।उसी समय श्री स्वामी ने दर्शन दिया और कुछ गोपनीय रहस्य से परिचित कराया।मुझे पता चला कि गुरू जी समाधि लेंगे और मुझे अब शिव श्री स्वामी के पास जाना है,उस समय मुझे पता चल गया था,कि जिन्हे मैं स्वप्न मे देखता रहा हूँ वो श्रीस्वामी श्री पिताम्बरा पीठ,दतिया के राष्टगुरू जो काशी विश्वनाथ जी के अवतार लेकर दतिया में बैठे है।जीवन में इतना रहस्य देखा हूँ कि अगर लिखूँ तो एक ग्रंथ बन जायेगा।शिव से शूरू करके साधना करते हुए अंत में स्वामी के चरणों मे अंतिम विश्राम तथा पुर्ण समर्पण अब स्वामी है,जैसा करे,अब वही शिव है वही माँ पीताम्बरा।काली माता ने श्री चरणों मै ला दिया।अब दतिया हमेशा आता रहा परन्तु अज्ञानता वश मेरी दीक्षा नही हो पा रही थी।श्री स्वामी अमृतेश्वर शिव के रूप मे विराजे है।श्री स्वामी ने कई बार मुझे कुछ रहस्य से परिचित कराया तथा कुछ ऐसा लीला रचे कि शारदीय नवरात्र में जाना पड़ा।वहाँ जाने पर पता चला कि कई साधक कई वर्षो से दीक्षा के लिए आए है,परन्तु दीक्षा नही मिलेगा ,कारण दीक्षा मे समय लगेगा,हो सकता है एकाध वर्ष,मैं तो घबड़ा गया और श्री स्वामी के अमृतेश्वर लिंग के पास जाकर कहा कि हे गुरूदेव आपने ही बुला लिया तो ये कैसी लीला है आपका तभी एक आदमी पिछे की ओर से कुछ बोला।मैं पिछे देखा कोई साधक थे ,बोले क्या कोई दिक्कत है मैंने कहा दीक्षा लेना था,उसपर वे बोले कि आप श्री विष्णुकान्त मुरिया जी से मिलिए,वही उपदेशक है,श्रीगुरू जी के प्रिय शिष्य तथा बहुत बड़े साधक के साथ दयालु है,और गुरू चरण पादुका के समक्ष गुरूकृपा से यही दीक्षा देते है।यहाँ जो होता है श्री स्वामी की इच्छा से होता है,और गुरूदेव ने बुलाया है तो दीक्षा अवश्य मिलेगा ऐसा मेरा विश्वास था।मै प्रथम बार श्री मुरिया जी के पास गया,एक दिव्य व्यक्तित्व रक्त परिधान मे एक गौरवर्ण को देख मैने कहा कि मुझे दीक्षा चाहिए तो मेरा नाम पूछा,और गम्भीर मुद्रा मे कहा मिल जायेगा आज ही,स्वयं उन्होने सारी प्रक्रिया पूर्ण करवा कर बोले कि तीन बजे दीक्षा के लिए आ जाए।मैं समय के पूर्व ही पधार गया ,नियत समय पर दीक्षा हुआ,वह क्षण लगा जैसे स्वामी चरण पादुका पर विराजमान मंद मंद मुस्कुरा रहे है,मै थोड़े पल के लिए चेतना शून्य हो गया।जप शूरू करने से पुरे नवरात्र कितने दिव्य अनुभव हुए जैसे जन्म जन्म की मुराद पूरी हुई हो।श्री विष्णुकान्त मुरिया जी परम साधक के साथ एक विशिष्ट ज्योतिष भी है,तथा इतने दयालु है की आज भी उनके मार्गदर्शन से आगे बढ रहा हूँ।हमेशा इन्होने मुझपर अपनी दया दृष्टि रख साधना के गोपनीय मर्म समझा कर मुझे आगे बढाते रहे है।मेरे इस लेख को पढने वाले को मै जरूर कहूँगा कि एक बार श्री पीताम्बरा पीठ जाकर श्री पीताम्बरा माई के साथ श्री स्वामी का दर्शन करे,तथा वहाँ श्री धूमावती माई,महाकाल भौरव,श्री बटुक भौरव,श्री गणेश जी,श्री हनुमान जी,हरिद्रा सरोवर के साथ श्री स्वामी मंदिरम् का दर्शन करे,वही अमृतेश्वर महादेव मे साक्षात श्री स्वामी जी महराज विराज रहे है।यहाँ पर प्राचीन वण्खण्डेश्वर शिव मंदिर भी साक्षात जाग्रत शिव है जो भीम के द्वारा प्रतीष्ठित है,यह अश्वथामा की साधना स्थली रही है साथ मे श्री परशुराम जी का दर्शन भी करे।श्री माँ त्रिपुर सुन्दरी का मंदिर भी है परन्तु वहाँ दर्शन करना संभव नही है।भारत का ऐसा दिव्य शक्ति पीठ जो आज कही ऐसा दिखाई नही देता,जाए तो श्री विष्णुकान्त मुरिया जी जैसे अलौकिक,साधक से मिल आपको आत्मिक शांति मिलेगा।मैने इनका विशाल हृद्वय देखा है,तथा ये कितने विलक्षण पूरूष है शायद मै समझ नही पाता हूँ,कोइ भी समस्या हो शीघ्र समाधान बता देते है।जब गुरू कृपा होती है,तो जीवन के परम सत्य दिखाई देने लगता है।यह गुरू कृपा ही है कि मै स्वामी चरण रज की धूली लगा पाया।नाना पंथ जगत के निज निज गुण गावै।सबका सार बता कर गुरू मारग लावै।मन ही बंधन है,आत्मा की बात करने से कुछ नही होगा,गुरू ही सब कर्ता है,जो जैसा पात्र होगा उस समय गुरू की कृपा मिल ही जाती है।यह स्थान झाँसी के पास है।जीवन मे जब कोई निशचल मन से साधना पर चल पड़े तो स्वामी कृपा करते ही है।

3 comments:

Patali-The-Village said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति | धन्यवाद|

Er. सत्यम शिवम said...

आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (21.05.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

नाना पंथ जगत के निज निज गुण गावै।
सबका सार बता कर गुरू मारग लावै।
बहुत सुंदर ......अर्थपूर्ण