"ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥"

Saturday, May 28, 2011

साईं बाबा

मैं बचपन से हनुमान जी एवं माँ दुर्गा का उपासक रहा हूँ,कम उम्र में सिद्ध गुरू मिल गए,लेकिन ये सब कृपा हनुमान जी का विशेष रहा है,बहुत बृहद अनुभूति है हनुमान जी का।सारे साधना शिव कृपा,गुरू कृपा माता की उपासना ये हनुमान जी की कृपा से संभव हो पाया है।जब औघड़ गुरू जी समाधि ले चुके उसके एक वर्ष बाद उन्होने दिव्य शरीर से आदेश किया की माता की प्रतिष्ठा तुम्हे अपने यहाँ करनी है।७,८वर्षो पहले मैने शिरडी साई बाबा का एक चित्र खरीद पूजा स्थान के उपर दिवाल में टांग दिया था।मेरा स्वभाव रहा है,कि मै सभी का आदर करता हूँ,परन्तु अंधविश्वास तथा हिन्दु धर्म के बहुत पांखड से हमे चिड़ है,इस पांखड के कारण हिन्दु धर्म विकृत हो गया है,साधु,सन्यासी के रूप मे अंहकारी भक्त भीड़,प्रतिष्टा,प्रवचन मे रातों दिन पैर पुजवाने,पैसा कमा कर अपने संस्था के विस्तार मे लगकर मानव का कल्याण क्या करेगे,ये सभी अंहकारी भक्त है।श्री रामकृष्ण को कहाँ फुर्सत थी,माँ की उपासना के अलावे और बाद मे सिद्ध होने के बाद मानव कल्याण मे लगे।मै साईं बाबा का पूजा भी नही करता था,लेकिन जब गुरू जी ने आदेश दिया तो मैने कहा कि हमारे पास पैसा नही है,कैसे माँ की प्रतिष्ठा कर पाउँगा,मै बहुत उदास था कि क्या होगा तभी उसी रात स्वप्न मे देखा किसी गुफा मे साईं बाबा है,मै उन्हें देखकर रोने लगा की क्या करूँ,बाबा माँ की प्रतिष्ठा कैसे करूँ,गुरू जी का आदेश का कैसे पालन करूँ,मै बाबा के चरणों मे रो रहा हूँ,तो साईबाबा ने मेरे सिर पर अपना हाथ रख कुछ गोपनीय रहस्य से परिचय कराया और कहा मै हूँ न, माता का स्थापना मै करा दूँगा, तु मत रो तथा जीवन के भविष्य की कुछ बाते बताए और मेरा आँख खुल गया।स्वप्न के बारे में मुझे खुद वृहद अनुभव रहा है।मै भावभिवोर था कि साईबाबा का मै कभी पूजा भी नही किया परन्तु उनकी इतनी बड़ी कृपा हुई।कुछ दिन बाद एक आदमी मुझे मंदिर बनाने के लिए कुछ जमीन देने को बोला,मै जमीन रजिस्ट्री कराने कल जाने वाला था,कि रात्री मे माता ने स्वप्न मे कहा कि दुसरे का जमीन मत लो जो तुम्हारे पास एकमात्र जमीन है,उसी पर मेरा स्थापना करो,तथा परिवार के साथ उसी मे रहो,स्वप्न के बाद मै समझ गया कि क्या करना है।बचपन से अभावो मे भी स्थिर रहने वाला मै सब कुछ माता, हनुमान जी पर छोड़ दिया था,दैव कृपा से मेरी पत्नि परम विदुषि एवं परम भक्त रही है,मेरे दोनो पुत्र सत्यम शिवम एवं शुभम शिवम भी बचपन से भक्ति और अच्छे संस्कार मे रहे है,हम सभी छल प्रंपच नही समझ पाते,इस लिए बचपन से सारे देव,देवी का इतना चमत्कार देखते आए है कि लिखूँ तो कई महिने लग जायेगे।अब घर बनाने के लिए कहाँ से धन आयेगा,कारन यह विश्वास था,कि बाबा बोले है,तो बनेगा।२ माह बाद ऐसा संयोग बना कि निर्माण कार्य शुरू हो गया,मुहल्ला के अंतिम छोर पर नदी किनारे घर बनने लगा,वहाँ रात्री मे कितने लोगो का समान चोरी हो जाता था,लेकिन कही से बड़े बड़े १५,२० कुते आ गये,तथा २४घंटे घर के आसपास रहते तथा रात्री में क्या मजाल कि कोई चोर प्रवेश कर पाए,खैर कितने कहानी है,घर के साथ माता का मंदिर बन गया ‌और माँ की प्रतिष्टा हो गई।साईं ने जो सपने मे कहाँ वह वे पूर्ण कर दिए,न धन की कमी हुई,न और कोई परेशानी,कैसे हो गया यह एक चमत्कारिक घटनाएं है।अब पता चला कि साई,तो सदगुरू,शिव,बिष्णु और परमात्मा ही है,बाकी उनका रहस्य मै जान नहीं सकता।मै तो यही समझता हूँ कि साई आए जीवन मे एक स्थिरता आई।औघड़ गुरू जी का आदेश तथा माता की प्रतिष्ठा साई बाबा ने पूर्ण कराया,इसलिए यह घर बाबा का है,जहाँ मै अपनी माँ का ध्यान कर सकता हुँ।उसी समय बटुक भैरव आए,तथा घर बनने के क्रम में सदगुरू स्वामी जी महराज श्री पीताम्बरा पीठ,दतिया से अंतिम दीक्षा हो पाया।एक वर्ष बाद साई बाबा ने मेरी पत्नि को शिरडी आने को कहाँ और हम सपरिवार शिरडी गए।छोटे छोटे कितने चमत्कार हमेशा होते रहता है,ऐसे है साईबाबा।मेरा अपना विचार हो सकता है शायद आपको संशय मे डाले फिर भी आज कुछ कहने को रोक नही पा रहाँ हूँ।अध्यात्म गणित नही है या सारे शास्त्र पढकर भी कुछ पता नही चल पायेगा,कारण असली ,नकली के फेर मे वही लोग पड़ते है,जो हर कार्य मे गणित के दृष्टि से देखते है।द्वैत,अद्वैत,रूप,लीला,शंकर छोटे कि राम बड़े,कौन धर्म या पंथ सही कौन, गलत, यह तो एक भक्त कभी नही सोचेगा,किसी को छोटा बड़ा समझना, भक्त को यह सब सोचने का समय नही है तथा वे क्या जाने ये प्रपंच।मानव का जन्म बड़े भाग्य से मिलता है,देवता भी तरसते है,यह सुनने मे बड़ा अच्छा लगता है,लेकिन क्या हम अपने को मनुष्य कह सकते है, यह हमें सोचना पड़ेगा।खोज आत्मा की करे जो मेरे ही अन्दर है,पर कैसे।कितने पंथ है क्या वह दुसरे से प्रेम करना सीख पाए,हम बड़ा,यह हमारा अंहकार और हमारा मन सारे बँधनो का कारण है।क्या झूठ,क्या है सच यह आप तब जानेगे जब आपकी दृष्टि गणितीय न होकर अध्यात्मिक हो तभी तो जानना होगा।आज जो समय आ गया है,कि धर्म के वेष मे लोग क्या क्या नही करते है,मैने जीवन मे जो देखा है,उसमे मैने पाया प्रत्येक दिन पूजा पाठी,व्रत उपवासी,२० वर्षो मे भी जितने सरल पहले थे,उससे ज्यादा भष्ट हो गये,क्या कारण है?यह सत्य है कि जब हम शुद्ध विचारो से जीवन मे अगर अध्यात्म का सहारा लेते है,उस समय परमात्मा हमारे साथ होता है,यह खुद हमे पता चल जाता है।शास्त्र,प्रवचन,से विचार शुद्धि हम कर पाते है कि नही यह हमे सोचना चाहिए।जीवन में कैसे रहा जाए ये हर किसी का अपना अलग स्वभाव है।साधना,भक्ति मार्ग मे लम्पटता से कुछ हासिल नही होगा। साईबाबा ने हमारे लिए क्या कहा "श्री साई सच्चरित मे....संसार जाल में फँसे हुए मनुष्यों को सदगुरू की आवश्यकता है या नही,इस प्रश्न को लेकर श्री अण्णासाहेब दाभोलकर और श्री काकासाहेब दीक्षित,दोनों ने प्रत्यक्ष परब्रम्ह श्री साई महाराज के सम्मुख चर्चा की थी।उसके बाद एक दिन बाहर जाने के लिए आज्ञा माँगते हुए श्री काकासाहेब ने यों ही प्रश्न किया"बाबा कहाँ जाऊ?"
श्री बाबा ने उत्तर दिया "ऊपर।"    इस पर श्री काकासाहेब ने तुरन्त ही दुसरा प्रश्न किया"परन्तु,मार्ग कैसा है। तब श्रीबाबा बोले"अरे भाई,ऊपर जाने के लिए अनंत मार्ग है।एक मार्ग यही शिरडी है,परन्तु यह मार्ग बड़ा भयानक और संकटपूर्ण हैं।शेर,सिंह,भेड़ियें आदि हिंसक पशु अपने जबड़े खोले हुए मार्ग रोके बैठे है।इस पर श्री काकासाहेब ने पुनःप्रश्न किया "बाबा,यदि हम कोई कुशल मार्ग दर्शक साथ लें तो?श्रीबाबा ने शान्तिपूर्वक उत्तर दिया "बहुत ही अच्छा!योग्य मार्गदर्शक मिला तो आप अवश्य ही अपने निर्दिष्ट स्थान तक पहुँच सकते है।वह मार्ग के सभी विघ्नो तथा संकटो को दूर कर या उनसे बचाकर आपकों सही मार्ग दिखायेगा और आपको अपना अंतिम ध्येय प्राप्त होगा।श्री साई महराज के ये वचन सुनकर श्री अण्णासाहेब दाभोलकर जी के मन में यह पूर्ण विश्वास उत्पन्न हो गया कि सदगुरू ही सच्चा मार्ग दर्शक है।उसका आशीर्वाद प्राप्त किए बिना किसी भी व्यक्ति के लिए यह भवसागर पार कर मोक्षपद तक पहूँचना सम्भव नही हो सकता। केवल धार्मिक ग्रंथो का पारायण करके या संतो के प्रवचनो को सुनकर मनुष्य अपनी आध्यात्मिक उन्नति नही कर सकता।परमार्थ प्रप्ति के लिए सदगुरू की अत्यन्त आवश्यकता है।इसलिए परमेश्वर बार बार अवतार लेकर आते है,इसलिये भक्तों को यही चाहिये कि वे सदगुरू के चरणों में अविचल निष्टा एंव पवित्र भक्ति भाव से पूर्ण समर्पण करें।इसलिए मानव है,तो अपना आत्म मंथन करना चाहिए।साईबाबा हमेशा भक्तों के साथ है।साई महिमा अनंत है,बाबा का वह वाणी "श्रद्धा और सबुरी" जीवन का सार तत्व है।

6 comments:

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

बाबा की कृपा बनी रहे ...नमन

Er. सत्यम शिवम said...

ॐ साई राम......."साई की लीला है निराली.करते है वो हर काम संसार लेता है हमारा नाम"...बहुत सुंदर पापा....साई की महिमा का बखान किया है आपने..सब तो साई कृपा ही है।

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (30-5-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

रश्मि प्रभा... said...

OM SAI RAM

Kailash C Sharma said...

ओम साईं नाथाय नमः...

Er. सत्यम शिवम said...

आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (04.06.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
चर्चाकार:-Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)
स्पेशल काव्यमयी चर्चाः-“चाहत” (आरती झा)