"ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥"

Sunday, January 1, 2012

सत्यम् शिवम् सुन्दरम्

निराकार सत्य या साकार सत्य या दोनो सत्य या दोनो असत्य या एक ही सत्यम् शिवम् सुन्दरम् तभी तो साईबाबा भी कहते है कि "सबका मालिक एक" क्या यह एक से अनेक रूप धारण करने वाला है।अगर अनेक रूप धारण करने वाला है तो बहुत रहस्य से युक्त भी होगा,सरल भी होगा वही कठिन भी होगा,ऋणात्मक होगा वही घनात्मक होगा,स्त्री भी होगा तो वही पूरूष भी होगा और एक साथ दोनो भी होगा जब सबका मालिक भी वही है तो हमे क्या करना चाहिए ,पता नही,मुझे नहीं जानना,मैं तो इस पांखड में विशवास ही नहीं करता,ये सब धर्म बेकार है मेरे पंथ मे आओ,मैं तो बहुत श्रद्धा भक्ती रखता हूँ ईशवर सत्य है,शिव बड़े.... "नहीं जी" शक्ति ही सब कुछ है,बेकार बात मत करो मैं वैष्णव, भगवान विष्णु ही सबके मालिक है,क्या बोल रहे हो माता गायत्री वेदमाता है आओ मेरे साथ,नहीं,नहीं,नही....ईशु दया करने वाले है आओ ईशु के शरण में आओ तुम्हें शांति मिलेगी,अरे यार अल्लाह ही सब कुछ है,मूर्ति पूजा में कुछ नहीं है,ईस्लाम ही सब कुछ है,अरे छोड़ो भी तुम क्या सत्य जानो "जय गुरूदेव"गुरू ही सब कुछ है वही परमात्मा है सभी उनकी ही संतान है।भाई मेरे महावीर ने राज्य त्याग कर सब कुछ पा लिया उनके पंथ पर भरोसा करो,तभी बड़े समूह से आवाज आती है "बु्द्ध शरणम् गच्छामि"जो बुद्ध कहते है वही धर्म है,क्या कहा काली बोल,दुर्गा बोल वही शक्ति सनातनी देवी है,हाँ बात तो सही है परन्तु सती ने राम की परिक्षा लिया क्या हूआ शिव ने उन्हें त्याग दिया तो राम से बड़ा राम का नाम है,तभी मीरा की आवाज "मैं तो प्रेम दिवानी....हे कृष्ण कहाँ हो तुम प्रेम हो या प्रेमी,परम परमात्मा हो या परम पूरूष "राधाकृष्ण तुम्हारी कृपा चाहिए ......बस मुझे कुछ नहीं सुनना कोई निराकार,साकार या भगवान नहीं होता,कर्म करो ,भोग करो।बन्धु आप पर शनि तथा राहु का कोप दृष्टि है,मंगल भी ठीक नहीं आप और आपके परिवार पर बहुत बड़ा संकट है,शांति करानी होगी,तभी संकट टलेगा,तभी शांति कराने वाले पंडित जी आ गये मैं ब्राह्मण हूँ कलियुग है बिना हमलोगो के आशिर्वाद का लोगो का कल्याण संभव नहीं है,सुन्दर श्लोक से उक्ति दे रहे और भगवान का सुन्दर कथा,वाह जजमान हमेशा फले,फुले ढेर सारा आशिर्वाद दे रहे है,पूजन शुरू हुआ संस्कृत का बड़ा शुद्ध और सुन्दर पाठ किये फिर बहुत मधुर आवाज में लिंगाष्टकम का पाठ हो रहा है,पंडित जी तथा वहाँ सारे श्रद्धालु द्रवित है,अंत में जजमान बड़ा कंजूस और चालाक है दक्षिणा तो कम दिया बड़ा ठग है,असंतुष्ट होकर चले गये,।भीड़ बढाओ संस्था आगे बढाना है,अब दर्शन शास्त्र की बात होगी,तुम्हारा मन ही कारण हे,तुम द्रष्टा बन साक्षी हो जाओ............कुछ नही होगा प्राणायाम,योग ही श्रेष्ठ है कपाल भांति,शरीर स्वस्थ रहेगा तो मन और आत्मा का उत्थान होगा,शिवोहम्"शिवोहम्....मै न शरीर हूँ न मन हूँ,मैं शिव हूँ।क्या यही हमारी दुनियाँ और हम है,दस बार मेरा कोई देवता या कोई बाबा,गुरू काम कर दे तो ठीक एक बार भी काम नहीं हुआ तो पांखडी,कौन किसकी सुने सभी का अपना बृहद मुण्ड है।जिस तरह हँस दूध मिश्रित जल से दूध ग्रहण कर जल का त्याग कर देता है वैसे ही सज्जन कही भी किसी धर्म या पंथ मे हो परम तत्व को प्राप्त  कर लेता है,निराकार,साकार दोनो के महत्व को समझ जाता है और ये आता है हंस जैसा कला सीखने पर, तभी तो कहा गया है कि"विष चखै कैसा,अमृत चखै जैसा"।रामायण के प्रथम रचनाकार भगवान शिव है तभी तो उन्होनें हनुमान जी की लीला को "सुन्दर काण्ड" नाम दिया,तभी तो सत्य ही शिव है और शिव ही सुन्दर है और हनुमान जी का रूप लेकर सीताराम रस के प्रधान नायक है।

3 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन बुलेटिन में लिंक्स हों - ज़रूरी तो नहीं (5) मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

arunkumar vyas said...

जय महाकाल

onkar kumar said...

बहुत बढ़िया लिखा है आपने