"ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥"

Wednesday, June 22, 2011

"श्री गणेश":-(शिव शक्ति के प्यारे)

माता-पिता के लिए संतान ही सबकुछ होता है।सर्वोपरि और परम माता- पिता शिव-शक्ति है इन्हें हम प्रकृति और पूरूष कहते है ये निराकार एवं निर्गुण है परन्तु बिना साकार के हम आंनदित नहीं हो सकते।कारण हम स्वयं साकार है,पहले जो साकार की लीला देखेगा वही तो निराकार के रहस्य से परिचित होगा।इस प्रकृति और पूरूष का जो परम प्रेम है वह श्री गणेश है और षडानन श्री कार्तिकेय जी है।ये दोनो पुत्र सृष्टि मे बड़े प्यारे है।शिव तो शक्ति के हृदय में रहते है और शिव के हृदय में रूद्र रूप हनुमान भक्ति से पूर्णरुपेण चैतन्य विराज रहे है।
वही श्री हनुमान के हृदय में श्री सीताराम जी विराज रहे है जो साक्षात विष्णु है।ये आकाश तत्व में महाशुन्य है जो चराचर जगत में व्याप्त है यही आदि गणेश है।शक्ति के गोद मे दुलार,प्यार कौन पायेगा,वही जो सनातन माता- पिता का पुत्र होगा।शिव-शक्ति का प्रेम अमिट है तथा संसार के सभी जीव इन्हीं की संतान है लेकिन जब शक्ति ने अपने उबटन से एक शिशु की मूर्ति बनाकर प्राण-प्रतिष्ठा का मंत्र फूंका तो एक सुन्दर बालक के रूप में श्री गणेश प्रकट हुए।गणेश क्या है मंगलदाता,भाग्य-विधाता।कारण एक बार गुरू गोरखनाथ जी ने दत्तात्रेय जी से पूछा कि कौन मुक्त है,कौन बन्धन दुःख में है,कौन नष्ट होता है और कौन अजर अमर है?यदि यह प्रकट करने योग्य हो तो आप इस पर प्रकाश डालिये।दत्तात्रेय जी ने कहा कि ब्रह्म मुक्त है,और प्रकृति दुःख सहती है।यही अपार गुप्त ज्ञान है।प्रकृति अपने दुःख के निवारण के लिए ही श्री गणेश की उत्पति से अपने सारे संतानो की पीड़ा हरती है तभी तो ब्रह्म शिव भी पुत्र प्रेम में गणपति को गोद मे बिठाये भक्तों का कल्याण करते है।इसलिये मातृॠण से मुक्त होने के लिये सभी जीव को शक्ति उपासना करनी चाहिये और वहाँ प्रथम पूज्य श्री गणेश को प्रसन्न किये बिना शक्ति की कृपा प्राप्त नहीं होती।गणेश जी के आशीर्वाद के फलस्वरुप ही माता-पिता जीव पर सबसे ज्यादा करूणा बरसाते हैं।बुद्धि के दाता श्री गणेश का हमारे शरीर में आधार चक्र के पास निवास का यहीं कारण हैं कि शक्ति के साथ ये सदैव विराजमान है,शिव तो आज्ञा चक्र से सहस्त्रसार मे बैठे है वहाँ तक पहुँचना बहुत कठिन है और नीचे शक्ति अलसायी सोयी रहती है।जब श्री गणेश की कृपा साधक पर होती है तो वे माँ को जगाकर ऊपर भागते है,तो शक्ति पुत्र के पिछे भागती है।अब तो साधक का कल्याण होना निश्चित ही है कारण गणेश हँसते खिलखिलाते शिव के गोद में जाकर बैठ जाते है,जिससे माँ भी अपने पुत्र के मोह और प्रेम वश शिव के पास पहुँच वामभाग में विराज जाती हैं।तब जीव समाधि में जाकर उस परम तत्व माता पिता का दर्शन कर लेता हैं,ऐसे कृपालु हैं हमारे गणेश।जीवन में बहुत पीड़ा हैं जीव को पर गणेश हर उस पीड़ा से निकाल बाहर करते है पल में।कितने स्वरूप में है गणेश जी विराजमान और उनकी अनेकानेक लीलाएँ है तभी तो गणेश प्रथम पूज्य है।कितना भी साधना उपासना कर लिजिये लेकिन श्री गणेश जी के कृपा के बिना आगे बढ पाना सम्भव ही नहीं।जिस त्रिपुर सुन्दरी को एक बार देखने के लिए साधक पुरा जीवन साधना में समर्पित कर देता है उस माँ के गोद में गणेश हँसते खिलखिलाते माँ को मोह में बाँधे रहते हैं।आदि शंकराचार्य के समय की एक घटना है।एक सिद्ध माता का मंदिर बन्द था कारण वह प्राचीन तांत्रिक पीठ था तथा वहाँ शक्ति कुपित हो गई थी।उस समय कितने साधक मंदिर के अन्दर गये लेकिन बाहर कभी नहीं निकल पाये।तभी एकबार वहाँ शंकराचार्य जी पहुँच गये तथा एक गणेश मूर्ति को प्राणप्रतिष्ठा कर गणेश स्तोत्र का पाठ करते हुये अन्दर पहुँच गये,अब तो जैसे ही माँ शक्ति श्री गणेश को देखी प्रसन्न हो गई और हमेशा के लिये वह मंदिर खुल गया,ऐसे है हमारे श्री गणेश जी।पति पत्नि में चाहे मतभेद रहता हो,सारे रिश्ते कही न कही तनाव पैदा कर देते हो परन्तु संतान सभी को प्यारा है कारण संतान में जीव को गणेश,कार्तिक दिखाइ देते है।सारा व्रत,उपवास,पूजन लोग अपने संतान को सुखी रखने के लिये ही करते है। जीवन में सारा पूर्व अर्जित पुण्य प्रताप संतान के दुःख मिटाने में ही लग जाता है,ऐसा होता है माता पिता का प्रेम।माता पिता के उस प्रेम की लाज श्रीगणेश शिव-शक्ति के पास रखते है और सारी अशुभता को दूर कर मंगल प्रदान करते हैं।गणेश की उपासना मात्र से सृष्टि के सभी देवी देवता कृपा करते हैं।एक बार एक भक्त स्त्री अर्धपागल हो गई,कारण किसी देवी मंदिर में कुछ गलती के कारण ऐसा हो गया था।मैंने गणेश मंत्र के साथ गणेश यंत्र दे दिया,कुछ ही दिनों में स्त्री पुर्ण ठीक हो गई तथा माता ने स्वप्न में दर्शन देकर आशिर्वाद भी दिया।अगर गणेश नहीं होते तो इस सृष्टि का कार्य सुचारू रूप से नहीं चल पाता,इसलिये माता ने सभी जीव पर विशेष कृपा कर श्रीगणेश की उत्पति कर उन्हें गजानन बनाकर सृष्टि में प्रथम पूज्य बना दिया।गणेश शीघ्र प्रसन्न होकर,भक्त के सारे अमंगल को हर कर मंगल प्रदान करते है।अनेकानेक लीलाएँ है गजानन की, ये ग्रह दोष,या कोई बाधा तत्क्षण दूर कर भक्त की मनोकामना पूर्ण कर देते हैं।"आज मै यहाँ श्रीगणेश की स्तुति पाठ दे रहा हूँ।एक मोदक या बेसन के प्रसाद के साथ ११ दूर्वा और सिन्दूर अर्पण कर गणेश जी का एक बार भी पाठ कर लिया जाय तो विघ्नों का शमन होता है और जीवन के हर कार्य में सफलता मिलता रहता है निरंतर।"
 -:श्रीगणेश स्तुति:-
चतुर्भुजं रक्ततनुं त्रिनेम् पाशांकुशौ मोदकपात्र दन्तौ।करैर्दधानं सरसीरूहस्थं,गणाधिनाथं शशिचूडमीडे॥
गजाननं भूतगणादि सेवितं कपित्थ जम्बूफल चारूभक्षणम्।उमासुतं शोकविनाशकारकं,नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजम्॥
अलिमण्डल मण्डित् गण्ड थलं तिलकीकृत कोमलचन्द्रकलम्।कर घात विदारित वैरिबलं,प्रणमामि गणाधिपतिं जटिलम्॥
खर्व स्थूलतनुं गजेन्द्रवदनं लम्बोदरं सुन्दरम्।प्रस्यन्दन्मदगन्धलुब्ध मधुपव्यालोल गण्डस्थलम्।दन्ताघात विदारितारि रूधिरैःसिंदूरशोभाकरं,वन्दे शैलसुता सुतं गणपतिं सिद्धिप्रदं कामदम्॥
नमो नमःसुरवर पूजितांघ्रये,नमो नमःनिरूपम मंगलात्मने।नमो नमःविपुल पदैक सिद्धयै,नमो नमः करिकलभाननाय ते॥
शुक्लाम्बरं धरं देवं,शशिवर्ण चतुर्भुजम्,प्रसन्न वदनं ध्यायेत,सर्वविघ्नोपशान्तये॥गणपतिर्विघ्नराजो लम्बतुण्डो गजाननः,मातुरश्च हेरम्ब एकदन्तो गणाधिपः॥
वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्य समप्रभः।निर्विघ्न कुरू मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।सर्व विघ्न विनाशाय सर्व कल्याण हेतवे,पार्वती प्रियपुत्राय गणेशाय नमो नमः॥
प्रातःस्मरामि गणनाथमनाथ बन्धु,सिंदूरपूर्ण परिशोभित गण्ड युग्मम्,उद्दण्डविघ्नपरिखण्डन चण्ड दण्डमाखण्डलादि सुरनायक वृन्द वन्द्यम्॥
प्रातर्नमामि चतुरानन वन्द्यमानं,इच्छानुकूलमखिलं च वरं ददानम्।तं तुन्दिलं द्विरसनाधिपयज्ञसूत्रं,पुत्रं विलास चतुरै शिवयोःशिवाय॥
प्रातर्भजाम्यभयदं खलु भक्त शोकं,दावानलं गणविभुं वरकुञ्जरास्यम्।अज्ञान कानन विनाशन हव्यवाहमुत्साहवर्द्धनमहं सुतमीश्वरस्य॥
                                       
    -:द्वादश गणेश स्तुति:-
प्रणम्य शिरसा देवं,गौरीपुत्र विनायकम्।भक्तावासं स्मरेन्नित्यं आयुःकामार्थ सिद्धये॥प्रथमं वक्रतुण्ड च एकदन्तं द्वितीयकम।तृतीय कृष्णपिंगाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम्॥
लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च।सप्तमं विघ्नराजं च धूम्रवर्ण तथाष्टकम्॥नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकं।एकादशं गणपतिं,द्वादशं तु गजाननम्॥
द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः।न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो॥

रात्री के बारह बज रहे थे,माँ का जप हो रहा था।विरह वेदना से प्राण व्याकुल हो गये थे,तभी ध्यान में गणेश आ गये।वे मुस्कुरा रहे थे तभी मैंने ध्यान से उन्हें अलग कर खुद को माँ के चरणों पर केंद्रित करना चाहा पर लाख चाहने पर भी गणेश टस से मस नहीं हुये।"आखिर चाहते क्या हो गणेश" तभी गुरू जी ध्यान में आकर बोले.....।गणेश का जप कर मना लो माँ को,माँ गणेश जी के पिछे खड़ी है।अब मैं गणपति गणपति कह रोने लगा तभी श्रीगणेश ने अपना सूंड़ मेरे माथे पर रख दिया।आगे जो हुआ वह मै यहाँ बता नहीं सकता।हिन्दू धर्म में बिना गणेश जी की कृपा प्राप्त किये कुछ भी संभव नहीं है।
कार्तिक जी शिव के त्रिनेत्र के तेज से प्रकट हुये है।ये दक्षिण भारत के ईष्ट देवता है,वे अपने पिता शिव के प्रचार के साथ शिव तत्व की प्राप्ति में जीव को तल्लीन रखते है।ये शिव शक्ति के प्रिय पुत्र है।

Friday, June 10, 2011

श्री पीताम्बरा माई

    अध्यात्मिक विचार सत्य की ओर जाने का एक रास्ता है।भाव प्रेम की परकाष्टा के शिखर पर पहुँचने का सुलभ यात्रा है।सुन्दर विचार मन के पार आत्मा की गहराईयों से प्रकट होता है।योगी,ध्यानी या मंत्रज्ञ जब अध्यात्म की ओर बढता है तो बीच मे भोग की माया रचित प्रलोभनों मे उलझनें की ज्यादा संभावना बढ जाती है।मार्गदर्शक या गुरू सिद्ध हो तो उचित रास्ता निकाल देता है और रास्ता सुगम हो जाता है।                                                                                                                                                               


     

















आज विश्व की जो स्थिति है यह बहुत बड़े अंहकारी लोगो के कारण है।धर्म क्या है हमे पशुता से मुक्त कर मानव से महामानव बना दे पर धर्म को सही समझ जाने पर।धर्म प्रेम पथ की डगर है।हिन्दू धर्म की व्यापकता से परे जो पथ भष्ट्र हुए वे अर्थ का अनर्थ कर दिए।कृष्ण ने कहा कि देखो अधर्म मत करो पांडव तुम्हारे भाई है इन्हे इनका पूरा हिस्सा नही भी,तो थोड़ा दे दो ये गुजारा कर लेंगे परन्तु कौरव नही माने,अंत मे शांति दूत बन अपना दिव्य रूप दिखाया तो भी कोई फर्क नही पड़ा,कृष्ण परमात्मा है अंहकारो से भरे ये दुर्जन पर दया कर सुधरने,समझने का कई मौका देने के बाद अततःमहाविनाश करना पड़ा।शाक्त पंथ क्या कहता है,शक्ति की उपासना से अर्थ,भोग,काम,मोक्ष प्राप्त होता है पर शाक्त कौन? नाम और जाप करने से ही नही शंकर जैसा स्वभाव शिव जैसा भोलापन अन्दर ,बाहर दिखाई देने लगे तब हम शाक्त बन पाते है।खानपान से वैष्णव नही मन से वैष्णव होना जरूरी है तभी हम विष्णु को देख पायेगे।परमात्मा अन्दर है वही बाहर है परन्तु दिखाई देता नही कारण हमारी आँखो में उसे देखने की ललक होनी चाहिए।हिन्दू धर्म मे सभी एक दुसरे को छोटा समझ विवाद करते है यह कैसा धर्म है।इसाई हिन्दू को मूर्ख समझे वही इस्लाम हिन्दू को तो हिन्दू सभी को मूर्ख समझते ये कैसा धर्म है।यह धर्म नही बस दिखावा मात्र है कि हम धार्मिक है।आज के बाबा खूब प्रवचन देते है मतलब भीड़ जुटाकर पैर पुजवाना और अपना अनुवायी बनाना ये कब करते है ध्यान या जाप इनमें आत्म बल बहुत होता होगा।रामकृष्ण परमहंस तो रात दिन माँ काली के ध्यान पूजन मै रहते परन्तु सिद्ध होने के बाद ही जनकल्याण कर पाए,फिर भी अंतिम समय पुजारी पंडित साजीश कर दक्षिणेश्वर से निकाल दिए वही मूर्ख पंडित धर्म के ठिकेदार है,इसीलिये धर्म विकृत हो गया है।सिर्फ सोचने या सम्प्रदाय मे जुड़ जाने से कोई धर्म को प्राप्त नही कर सकता।बात उन दिनों की है जब माँ काली की साधना में आन्नद आ रहा था,तभी मुझे कभी कभी श्री बगलामुखी का स्मरण हो जाता कारण काली मंदिर मे लोगो के कल्याण हेतु औघड़ गुरू जी माँ बगला का अनुष्ठान कराते,उतने दिन तक माँ को फल मिष्टान,पुआ का भोग लगता तथा काली माँ को पीत वस्त्र पहनाया जाता तो मै देख सोचता हे माँ क्या तु ही सारे रूप धारण करती हो क्या मै तेरे बगला रूप की साधना कर पाउँगा।तंत्र मार्ग सहज नही है इस मार्ग मे गुरू और इष्ट के बिना सब व्यर्थ है। माँ के तरफ से संकेत मिला था लेकिन शीघ्रता से लिया गया मेरा फैसला अनिष्ट होते होते बचा।एक दिन घर के पूजा स्थान मे मैने बगला का पाठ एंव मंत्र का जप कर लिया ,मन बेचैन हो गया तभी शाम के वक्त एक विषधर नाग आंगन मे घुस गया और पूजा रूम के जंगला होते घर मे घुसने लगा तभी मेरी पत्नि पूजा रूम से नाग को रोकने लगी,नाग भी गुस्सा में छत्र खड़ाकर, लगता था कि काट खायेगा परन्तु मेरी पत्नि भी हाथ खड़ा कर दी उस समय मेरे दोनो पुत्र भी घर पर थे पर मै शहर मे था तभी मेरे पुत्र ने मुझे फोन किया मै शीघ्र घर आया तो वह भंयकर दृश्य देख सरसों अभिमंत्रित कर नाग पर फेंका और पत्नि को हटाया। नाग को किसी तरह बाहर किया गया,इस घटना के बाद मै उदास हो गया था कि माँ बगला की साधना शायद मै नही कर पाउँगा।एक माह बिता होगा कि ग्वालियर के एक भक्त ने मुझे अपने यहाँ बुलाएं मुझे खुशी हुई कि प्रथम बार श्रीस्वामी के पास माँ बगला का दर्शन होगा,माँ बगला का ही एक नाम पीताम्बरा है। जब प्रथम बार दतिया पहुँचा तो शरीर काँप रहा था भाव विहवल आँसु गिरता रहा तभी लगा कि माँ काली तथा गुरू जी साथ है,पीताम्बरा माई को देख माँ काली के श्याम वर्ण की छवि गौर वर्ण मे देख अपने आप को सम्पूर्णता से अर्पण किया।बहुत ऐसी घटनायें है लेकिन सभी बातो को बताना उचित नही है।पीताम्बरा की साधना बड़े बड़े पंडित, साधक मंच पर भाषण देने वाले लोग के बस की बात नही है ,जिसपर शिव,काली कृपा करे और सिद्ध गुरू मिले उसके लिए ये अंतिम साधना हो सकता है।माँ पीताम्बरा अपने भक्त को तकलीफ में देख नही पाती है कारण यह काली की ही एक रूप है।बगलामुखी की उत्पति की कथा  है कि पहले कृत युग में सारे संसार का नाश करने वाला भंयकर तूफान उपस्थित हुआ इससे सारे जीव त्राहीमाम करने लगे तब उसे देखकर भगवान विष्णु चिंतित होकर इस विनाश लीला से निपटने के लिए सौराष्ट्र देश में हरिद्रा सरोवर के समीप तपस्या करने लगे तब श्रीमहात्रिपुर सुंदरी प्रकट हुई,ये ही बगला रूप में प्रकट होकर उस भंयकर तूफान को क्षण मात्र में रोक दिया और वह भंयकर तुफान शांत हो गया।त्रैलोक्य स्तंभिनी ब्रह्मास्त्र रूपा श्रीविद्या की वैष्णव तेज से युक्त मंगलवार "वीर रात्री"चतुर्दशी को माँ बगलामुखी का आविर्भाव हुआ।इनकी अराधना करने वाला साधक सिद्ध हो जाता है।ये स्तंभन की शक्ति के साथ त्रिशक्ति कहलाती है,पृथ्वी,स्वर्ग,सारे लोक इनके प्रभाव से ठहरा है।दारिद्रय,वाद विवाद ,शत्रु,रोग,अचानक आपदा,भय,भुत पिशाच,तंत्र,ग्रह बाधा जीवन मे अनुकूलता सभी का शमन कर ये भोग के साथ मोक्ष प्रदान करती है।ये क्या नहीं कर सकती,ये परम करूणामयी माता है।बहुत सुसंस्कारित व्यक्ति ही इनकी साधना कर पाते है।एक बार की बात है एक बहुत ही सज्जन बैंक अधिकारी के मकान को कुछ बड़े अपराधी कब्जा कर लिए,पुलिस,नेता से पैरवी कराने के बाद भी वे मकान छोड़ने की बात तो दूर उन्हें भी धमकाते,अब वे सज्जन आत्महत्या पर उतारू हो गये तभी मेरे सम्पर्क मे आये,उनका मानसिक अवस्था देख मै उन्हे लेकर कब्जा वाले मकान पर जा पहुँचा।मेरे जाते ही १५,२० अपराधी घेर लिए वे बहुत कोध्र मे अशब्दों का प्रयोग करने लगे तभी मैंने माँ का स्मरण किया १० मीनट मे ही स्थिति उल्टी हो गई, वे सज्जन बन मेरा परिचय जानने लगे पर मैने बताया नही,सिर्फ इतना ही कहा कि जीवन मे कुछ गल्ती का दंड जब मिलने लगता है तो कोइ भी साथ नहीं देता आप सभी  घर खाली कर दे।माँ ने लगा सभी को पंगु और सज्जन बना दिया था,उसमे ऐसे अपराधी थे कि दान धर्म से दूर वे सिर्फ गलत कार्य ही करते थे,वे विन्रम होकर बोले कि १५ दिन का समय दे मकान खाली कर देंगे।मेरे शहर से १०० कोस दूर वे मुझे जानते भी नही थे।वे माँ के लीला को क्या जाने मेरा आवाभगत करने लगे तभी उसके एक मित्र जो वहाँ के बड़े अधिवक्ता थे आ गये,वे मुझे पहचानते थे,अब जब वे मुझे देख भावविभोर हो गये तो कहना ही क्या उन बैंक अधिकारी से माफी मांगने लगे और ५दिन में मकान खाली किए तथा किराया जो एक वर्ष का बाकी था वह भी दे दिए,ऐसा प्रभाव है माँ पीताम्बरा माई का।बगला परम शक्ति सिद्ध 
विद्या है इन्हें जनमानस के कष्ट देख साक्षात शिव को ही श्रीस्वामी के रूप मे दतिया में पीताम्बरा पीठ की स्थापना करनी पड़ी,उनके द्वारा रचित श्रीबगलामुखी रहस्य दुर्लभ हैं।इनके मंत्र जप से कुण्डिलिनी शक्ति जाग्रत होने लगता है।विश्व की सारी संयुक्त शक्ति मिलकर भी इन बगला शक्ति का मुकाबला नही कर सकते परन्तु दुर्भाग्य है हम लोगो का बगला के रहते भी हम असहाय है,कारण इनकी उपासना मे हमे सरल चित होना पड़ेगा।इनकी उपासना मे मंत्र जप क्रम पद्धति से करना पड़ता है,एक अक्षर से आगे ३६ अक्षर इनका मुख्य मंत्र है।कवच,स्तोत्र,न्यास अंग पूजा मे गुरूमंत्र,गणेश,मृत्युञ्जय मंत्र,गायत्री,बटुक भैरव,योगिनी,विडालिका यक्षिणी का पूजन जप होता है।इनके षोढान्यास साधक माता ,गुरू के अलावा किसी को प्रणाम नही कर सकते, कारण कोइ भी इनके प्रणाम करने से महापतन को प्राप्त हो सकता है।पीताम्बरा का साधक अगर सिद्ध हो गया तो शिव के समान हो जाता है।इनकी साधना करने से कोइ भी कामना शीघ्र पूर्ण हो जाता है।कई जन्मों के पुण्य प्रभाव जब एक साथ मिल जाए तो गुरू मिलते है और इनकी साधना हो पाती है। इन्हे सिद्ध विद्या कहा गया इस लिए कि ये अपने साधक को सारी गंदगी साफ कर शुद्ध बुद्ध बनाकर सिद्ध कर देती है।आज धर्म,उपासना में विशेष लोगो का रूझान बढा है वही छदम भेष बनाकर स्वयं,सिद्ध,गुरू बन रहे है तो एक बार दतिया पीताम्बरा माई के दर्शन कर आए लेकिन सरलचित होकर जाए वहाँ स्वामी,पीताम्बरा दोनो की कृपा मिलेगी।दशों महाविद्यायें करूणामयी है,उनके उग्र स्वभाव पर न जाए भक्त के लिए महामाई है लेकिन गलत लोगो पर भले ये दिखावटी क्रोध करती हो तथा दुष्टों के लिए तो कालरात्री है।अपने भक्त पर इनकी ऐसी दया है कि रक्षा के साथ कुल की भी रक्षा करती है साथ सभी कुछ खुद सम्हाल लेती है ये पीत वस्त्र धारण करती है।ये माँ त्रिपुरसुन्दरी है।सांख्यायन तंत्र में बहुत सारा प्रयोग है तथा मंत्र महावर्ण,तन्त्रसार में इनकी उपासना का विधान है परन्तु इस पृथ्वी पर एकमात्र श्री पीताम्बरा पीठ ही है जहाँ से शुद्ध रूप से विधि प्राप्त हो सकता है।इनके यंत्र पूजा का विधिवत आवरण पूजन सांगोपांग करना पड़ता है।माँ बगला के शिव मृत्युञ्जय है जो शस्त्र विहिन है अपने आठो हाथ के साथ माँ अमृतेश्वरी के साथ विराजमान है।शिव चार हाथ से दिव्य कलश से अपने उपर अमृत का अभिषेक कर रहे है,उनका यह इशारा है कि ये बगला शक्ति के साथ अमृत रूप मे चारों हाथ अर्थ,धर्म,काम,मोक्ष देने वाला है तथा नीचे का चार हाथ में दो में से एक हाथ की मुद्रा ज्ञान का प्रतीक है कि जीव तुमको ज्ञान हो गया कि तुम "मै ,ही, हूँ कोइ भेद नहीं तुम परमात्मा हो ये कैसे हुआ कारण मेरे एक हाथ में जप मालिका यानि पवित्र होकर जप करो,जपात् सिद्धि,जपात् सिद्धि,जप करने से तुम सिद्ध हो पाए तभी जाकर नीचे के दो हाथ से जीव को अमृत बांटो उसे भव रोग से मुक्त करो।जप में "ज"अक्षर जीव मे "ज"अक्षर जगत मे "ज"अक्षर जगदम्बा में "ज"अक्षर यानि जप से जगदम्बा  प्रसन्न होकर जगत में जीव को स्वरूप प्रदान करती है और जीव अष्टपाश से मुक्त होकर शिव बन जाता है।कुण्डिलिनी शक्ति नाभी के बहुत नीचे है तथा शिव सबसे उपर आज्ञा चक्र मे तथा सहस्त्रसार में है,बीच में कुण्डिलिनी के उपर श्रीगणेश,बह्मा,विष्णु,आत्मा,भूलोक कइ देवि,देवता कण्ठ में शक्ति आज्ञा चक्र में गुरू,शिव खड़े है और अंत मे परमात्मा शिव निराकार,साकार, विराजमान है ,वहाँ शक्ति ही ले जाती है तब शिव शक्ति एक हो जाते है उन्हें पीताम्बरा कहे या श्री स्वामी शिव। कुछ शेष नही रहता तभी तो श्री स्वामी ने सिद्धान्त रहस्य में कहा है कि "जो पराशक्ति समस्त जगत को चैतन्य प्रदान करके स्वरूप प्रदर्शित करने के योग्य बनाती है सत् चितआनन्द जिसका स्वरूप है ब्रह्मा,विष्णु,महेश भी जिसकी आशा करते है।जो दयामयी है अपनी सभी सन्तानों पर जिसकी अपार असीम कृपा हो रही है।जिसकी सहायता बिना ब्रह्म भी शव के तुल्य है।उसकी भक्ति मातृॠण से मुक्त होने के लिये सभी संसार को करनी चाहिए,ऐसी जगतमाता की भक्ति जोनहीं करता वास्तव में उसका बड़ा भारी दिर्भाग्य है,क्योंकि ऐश्वर्य,भक्ति,मुक्ति,ज्ञान,निश्रेयस आदि फलों की दाता वही है।  

Saturday, May 28, 2011

साईं बाबा

मैं बचपन से हनुमान जी एवं माँ दुर्गा का उपासक रहा हूँ,कम उम्र में सिद्ध गुरू मिल गए,लेकिन ये सब कृपा हनुमान जी का विशेष रहा है,बहुत बृहद अनुभूति है हनुमान जी का।सारे साधना शिव कृपा,गुरू कृपा माता की उपासना ये हनुमान जी की कृपा से संभव हो पाया है।जब औघड़ गुरू जी समाधि ले चुके उसके एक वर्ष बाद उन्होने दिव्य शरीर से आदेश किया की माता की प्रतिष्ठा तुम्हे अपने यहाँ करनी है।७,८वर्षो पहले मैने शिरडी साई बाबा का एक चित्र खरीद पूजा स्थान के उपर दिवाल में टांग दिया था।मेरा स्वभाव रहा है,कि मै सभी का आदर करता हूँ,परन्तु अंधविश्वास तथा हिन्दु धर्म के बहुत पांखड से हमे चिड़ है,इस पांखड के कारण हिन्दु धर्म विकृत हो गया है,साधु,सन्यासी के रूप मे अंहकारी भक्त भीड़,प्रतिष्टा,प्रवचन मे रातों दिन पैर पुजवाने,पैसा कमा कर अपने संस्था के विस्तार मे लगकर मानव का कल्याण क्या करेगे,ये सभी अंहकारी भक्त है।श्री रामकृष्ण को कहाँ फुर्सत थी,माँ की उपासना के अलावे और बाद मे सिद्ध होने के बाद मानव कल्याण मे लगे।मै साईं बाबा का पूजा भी नही करता था,लेकिन जब गुरू जी ने आदेश दिया तो मैने कहा कि हमारे पास पैसा नही है,कैसे माँ की प्रतिष्ठा कर पाउँगा,मै बहुत उदास था कि क्या होगा तभी उसी रात स्वप्न मे देखा किसी गुफा मे साईं बाबा है,मै उन्हें देखकर रोने लगा की क्या करूँ,बाबा माँ की प्रतिष्ठा कैसे करूँ,गुरू जी का आदेश का कैसे पालन करूँ,मै बाबा के चरणों मे रो रहा हूँ,तो साईबाबा ने मेरे सिर पर अपना हाथ रख कुछ गोपनीय रहस्य से परिचय कराया और कहा मै हूँ न, माता का स्थापना मै करा दूँगा, तु मत रो तथा जीवन के भविष्य की कुछ बाते बताए और मेरा आँख खुल गया।स्वप्न के बारे में मुझे खुद वृहद अनुभव रहा है।मै भावभिवोर था कि साईबाबा का मै कभी पूजा भी नही किया परन्तु उनकी इतनी बड़ी कृपा हुई।कुछ दिन बाद एक आदमी मुझे मंदिर बनाने के लिए कुछ जमीन देने को बोला,मै जमीन रजिस्ट्री कराने कल जाने वाला था,कि रात्री मे माता ने स्वप्न मे कहा कि दुसरे का जमीन मत लो जो तुम्हारे पास एकमात्र जमीन है,उसी पर मेरा स्थापना करो,तथा परिवार के साथ उसी मे रहो,स्वप्न के बाद मै समझ गया कि क्या करना है।बचपन से अभावो मे भी स्थिर रहने वाला मै सब कुछ माता, हनुमान जी पर छोड़ दिया था,दैव कृपा से मेरी पत्नि परम विदुषि एवं परम भक्त रही है,मेरे दोनो पुत्र सत्यम शिवम एवं शुभम शिवम भी बचपन से भक्ति और अच्छे संस्कार मे रहे है,हम सभी छल प्रंपच नही समझ पाते,इस लिए बचपन से सारे देव,देवी का इतना चमत्कार देखते आए है कि लिखूँ तो कई महिने लग जायेगे।अब घर बनाने के लिए कहाँ से धन आयेगा,कारन यह विश्वास था,कि बाबा बोले है,तो बनेगा।२ माह बाद ऐसा संयोग बना कि निर्माण कार्य शुरू हो गया,मुहल्ला के अंतिम छोर पर नदी किनारे घर बनने लगा,वहाँ रात्री मे कितने लोगो का समान चोरी हो जाता था,लेकिन कही से बड़े बड़े १५,२० कुते आ गये,तथा २४घंटे घर के आसपास रहते तथा रात्री में क्या मजाल कि कोई चोर प्रवेश कर पाए,खैर कितने कहानी है,घर के साथ माता का मंदिर बन गया ‌और माँ की प्रतिष्टा हो गई।साईं ने जो सपने मे कहाँ वह वे पूर्ण कर दिए,न धन की कमी हुई,न और कोई परेशानी,कैसे हो गया यह एक चमत्कारिक घटनाएं है।अब पता चला कि साई,तो सदगुरू,शिव,बिष्णु और परमात्मा ही है,बाकी उनका रहस्य मै जान नहीं सकता।मै तो यही समझता हूँ कि साई आए जीवन मे एक स्थिरता आई।औघड़ गुरू जी का आदेश तथा माता की प्रतिष्ठा साई बाबा ने पूर्ण कराया,इसलिए यह घर बाबा का है,जहाँ मै अपनी माँ का ध्यान कर सकता हुँ।उसी समय बटुक भैरव आए,तथा घर बनने के क्रम में सदगुरू स्वामी जी महराज श्री पीताम्बरा पीठ,दतिया से अंतिम दीक्षा हो पाया।एक वर्ष बाद साई बाबा ने मेरी पत्नि को शिरडी आने को कहाँ और हम सपरिवार शिरडी गए।छोटे छोटे कितने चमत्कार हमेशा होते रहता है,ऐसे है साईबाबा।मेरा अपना विचार हो सकता है शायद आपको संशय मे डाले फिर भी आज कुछ कहने को रोक नही पा रहाँ हूँ।अध्यात्म गणित नही है या सारे शास्त्र पढकर भी कुछ पता नही चल पायेगा,कारण असली ,नकली के फेर मे वही लोग पड़ते है,जो हर कार्य मे गणित के दृष्टि से देखते है।द्वैत,अद्वैत,रूप,लीला,शंकर छोटे कि राम बड़े,कौन धर्म या पंथ सही कौन, गलत, यह तो एक भक्त कभी नही सोचेगा,किसी को छोटा बड़ा समझना, भक्त को यह सब सोचने का समय नही है तथा वे क्या जाने ये प्रपंच।मानव का जन्म बड़े भाग्य से मिलता है,देवता भी तरसते है,यह सुनने मे बड़ा अच्छा लगता है,लेकिन क्या हम अपने को मनुष्य कह सकते है, यह हमें सोचना पड़ेगा।खोज आत्मा की करे जो मेरे ही अन्दर है,पर कैसे।कितने पंथ है क्या वह दुसरे से प्रेम करना सीख पाए,हम बड़ा,यह हमारा अंहकार और हमारा मन सारे बँधनो का कारण है।क्या झूठ,क्या है सच यह आप तब जानेगे जब आपकी दृष्टि गणितीय न होकर अध्यात्मिक हो तभी तो जानना होगा।आज जो समय आ गया है,कि धर्म के वेष मे लोग क्या क्या नही करते है,मैने जीवन मे जो देखा है,उसमे मैने पाया प्रत्येक दिन पूजा पाठी,व्रत उपवासी,२० वर्षो मे भी जितने सरल पहले थे,उससे ज्यादा भष्ट हो गये,क्या कारण है?यह सत्य है कि जब हम शुद्ध विचारो से जीवन मे अगर अध्यात्म का सहारा लेते है,उस समय परमात्मा हमारे साथ होता है,यह खुद हमे पता चल जाता है।शास्त्र,प्रवचन,से विचार शुद्धि हम कर पाते है कि नही यह हमे सोचना चाहिए।जीवन में कैसे रहा जाए ये हर किसी का अपना अलग स्वभाव है।साधना,भक्ति मार्ग मे लम्पटता से कुछ हासिल नही होगा। साईबाबा ने हमारे लिए क्या कहा "श्री साई सच्चरित मे....संसार जाल में फँसे हुए मनुष्यों को सदगुरू की आवश्यकता है या नही,इस प्रश्न को लेकर श्री अण्णासाहेब दाभोलकर और श्री काकासाहेब दीक्षित,दोनों ने प्रत्यक्ष परब्रम्ह श्री साई महाराज के सम्मुख चर्चा की थी।उसके बाद एक दिन बाहर जाने के लिए आज्ञा माँगते हुए श्री काकासाहेब ने यों ही प्रश्न किया"बाबा कहाँ जाऊ?"
श्री बाबा ने उत्तर दिया "ऊपर।"    इस पर श्री काकासाहेब ने तुरन्त ही दुसरा प्रश्न किया"परन्तु,मार्ग कैसा है। तब श्रीबाबा बोले"अरे भाई,ऊपर जाने के लिए अनंत मार्ग है।एक मार्ग यही शिरडी है,परन्तु यह मार्ग बड़ा भयानक और संकटपूर्ण हैं।शेर,सिंह,भेड़ियें आदि हिंसक पशु अपने जबड़े खोले हुए मार्ग रोके बैठे है।इस पर श्री काकासाहेब ने पुनःप्रश्न किया "बाबा,यदि हम कोई कुशल मार्ग दर्शक साथ लें तो?श्रीबाबा ने शान्तिपूर्वक उत्तर दिया "बहुत ही अच्छा!योग्य मार्गदर्शक मिला तो आप अवश्य ही अपने निर्दिष्ट स्थान तक पहुँच सकते है।वह मार्ग के सभी विघ्नो तथा संकटो को दूर कर या उनसे बचाकर आपकों सही मार्ग दिखायेगा और आपको अपना अंतिम ध्येय प्राप्त होगा।श्री साई महराज के ये वचन सुनकर श्री अण्णासाहेब दाभोलकर जी के मन में यह पूर्ण विश्वास उत्पन्न हो गया कि सदगुरू ही सच्चा मार्ग दर्शक है।उसका आशीर्वाद प्राप्त किए बिना किसी भी व्यक्ति के लिए यह भवसागर पार कर मोक्षपद तक पहूँचना सम्भव नही हो सकता। केवल धार्मिक ग्रंथो का पारायण करके या संतो के प्रवचनो को सुनकर मनुष्य अपनी आध्यात्मिक उन्नति नही कर सकता।परमार्थ प्रप्ति के लिए सदगुरू की अत्यन्त आवश्यकता है।इसलिए परमेश्वर बार बार अवतार लेकर आते है,इसलिये भक्तों को यही चाहिये कि वे सदगुरू के चरणों में अविचल निष्टा एंव पवित्र भक्ति भाव से पूर्ण समर्पण करें।इसलिए मानव है,तो अपना आत्म मंथन करना चाहिए।साईबाबा हमेशा भक्तों के साथ है।साई महिमा अनंत है,बाबा का वह वाणी "श्रद्धा और सबुरी" जीवन का सार तत्व है।

Tuesday, May 17, 2011

श्री स्वामी


                                                 राष्ट्र गुरु "श्री स्वामी जी" गुरुदेव .....

सारा जीव अपने कर्मो का आदान प्रदान ही तो कर रहा है।कोई किसी का बात मानते नही कारण सभी अपने हिसाब से ज्ञानी है,इस सृष्टि मे गुरू तत्व ही है जो हमें इस कर्म जाल से मुक्त करते है और वह गुरू तत्व परम शिव तत्व है।शिव से बड़ा कोई किसी का शुभ चिन्तक हो नही सकता।शिव ही अनेक रूप घारण कर हमे शांति प्रदान करता है।शिव ही शक्ति है,शिव ही विष्णु है,शिव ही हनुमान है,शिव ही साक्षात परम ब्रह्म जगत गुरू है।जब हमारे गुरू श्री स्वामी जी महराज दतिया मे विराज रहे थे तो तीन विदेशी धर्माचार्य भारत भ्रमण करते हुए दतिया आ पहुँचे।सन्त फ्रांसिस,सन्त जोजिफ,और सन्त पीटर ये श्री स्वामी का नाम सुनकर आए हुए थे।अनेक लोगो ने श्री स्वामी की दिव्यता,साधना एवं विद्वता का गुणगान किया तभी वे तीनो सन्त दतिया पधारे थे।श्री स्वामी तो साक्षात शिव है,उन्हें क्या पता नही हैं।उस समय गुरूदेव आश्रम के प्रांगण में सैंभल के एक वृक्ष के नीचे विराजे थे।श्री स्वामी को उन्होंने अभिवादन किया और फिर बैठ गये।वे सन्त टूटी फूटी हिन्दी भी बोलते थे।बड़े जिज्ञासु भाव से उन विदेशी धर्माचार्यो ने कहा कि "हे सन्त शिरोमणि! मनुष्य ईश्वर से मिलने के लिए बहुत से प्रयत्न करता है और फिर खुद उससे मिलने जाता है,हम जानना चाहते हैं कि क्या कभी ईश्वर भी मनुष्य से मिलने के लिए आता है।उस सन्त का वचन सुनकर श्री स्वामी मुस्कराए और कहने लगे,हे ईश्वर को चाहने वाले बन्दो! ईश्वर मनुष्यों से मिलने के लिए हमारें देश में तो आता है,लेकिन तुम्हारे देश में आता है या नही,तुम लोग अनुसंधान करो।श्री स्वामी का यह वचन सुन वे फिर बोले क्या आपने कभी ईश्वर को देखा है?श्री गुरूदेव ने करूणा से उन सन्तो को देख कहा मैंने तो ईश्वर को नहीं देखा है लेकिन क्या तुमने भी कभी अपने प्रभु यीशु को देखा हैं।वे विदेशी साधु कहने लगे॓,नहीं हमने भी नही देखा है।तब प्रभु श्री स्वामी ने कहा यदि पुत्र होता है तो उसका पिता भी होता है।जिस काया का पुत्र होता है।उसी काया का बाप होना आवश्यक है अन्थया पिता नही माना जा सकता।रात्रि के समय अपने प्रभु यीशु से पूछना कि आपका पिता कौन है और हमें उनके दर्शन कराओ।गुरूदेव का यह वचन सुन वे तीनों विदेशी साधु राजकीय विश्राम गृह चले गए।रात्रि में सोने से पहले उन तीनों नें अपने प्रभु यीशु से उसी प्रकार प्रार्थना की और अलग अलग कमरे में सो गयें।रात्रि में तीनों साधुओं ने एक ही से स्वप्न देखे।उन्होनें देखा कि यीशु उनके पास आए और उनसे कहने लगे कि मेरे पिता वे ही हैं जिनके तुमने दिन  में दर्शन किये थे।यीशु ने श्री स्वामी जी का एक चित्र भी उन साधुओं को दिखाया।सूर्योदय से पहले ही वे तीनो विदेशी सन्त आश्रम पहुँच गए और बरामदे में विराजे परमात्मा सदाशिव श्री स्वामीजी को साष्टांग नमन कर कहने लगे हे जगतगुरू परमपिता हमने यीशु के पिता को देख लिया है और यह भी जान गए हैं कि ईश्वर मनुष्य से मिलने के लिए स्वयं भी आता है।भारत आने का उदेश्य हमारा पूरा हो गया,अब हम अपने देश चले जायेगे।श्री हनुमान जी की बचपन से की साधना ही हमै आगे बढाया।२० वर्ष बित जाने पर गुरू के लिए जो व्याकुलता हमे किन किन संतो,साधको के पास नही ले गया परन्तु कही चैन नही मिला।कारण बचपन से हममे एक लक्षण रहा कि कोई गलत चीज हमे शूट ही नही करता चाहे वह खानपान हो या और कोई चीज।बड़े बड़े साधको के पास जा कर भी भरोसा नही हो पाया तभी हनुमान जी ने स्वप्न में कुछ गोपनीय बात बताया।मैने शिव का ध्यान कर एक मंत्र का जप शुरू किया और इस संकल्प के साथ कि या गुरू मिलेगे या जान दूंगा दो रोज बिना खाए,पिए जप के साथ रोता रहा तभी गहरे ध्यान या नींद में शिव का दर्शन हुआ तथा जीवन के भविष्य के बारे मे ज्ञात हुआ।वचपन से कितने दिव्य स्वप्न आते रहे थे,उसका रहस्य पता चला।इस स्वप्न के बाद करीब चार माह बाद मेरे ज्योतिष गुरू श्री दुर्गा प्रसाद जी ने अचानक एक दिन एक परम साधक श्री सीताराम जी औघड़,काली भक्त से मिलवाये।वे दिव्य विभूति सफेद वस्त्र मे एक रक्तवर्ण दुपट्टा धारण किए, वे मुझे देख हंसने लगे और कहा कि काली साधना करना है वही जगदम्बा तुम्हे सब कुछ दे सकती है।काली से मुझे भय लगता था,लेकिन एक दिन गुरू कृपा ही रहा की मै आगे बढता गया।नौ वर्ष गुरू जी के मार्गदर्शन मे कठोर साधना करता रहा,गुरू जी वाममार्गी साधक थे एक दिन उन्होने कहा मांस मदिरा ले तभी माँ की कृपा प्राप्त होगी,कारण गुरू जी के अधिकतर शिष्य जो न जाने क्यों मुझसे घृणा ही करते थे मैं उनके नजर मे पांखडी तथा अंहकारी था कारण मैं बहुत अनुशासन मे रहने वाला रहा हूँ।मेरे माँ,पिता की मृत्यु को गुरू कृपा से उबर गया लेकिन गुरू मेरे अंनत गहराईयो मे विराजमान थे।उस गुरू सानिध्य में माँ का दिव्य पूजन तथा रात्रि में शिवाभोग,भैरवभोग तो अति रहस्यमय था।जब मांस मदिरा की बात चली तो मैने गुरू देव से कहा हे गुरूदेव मैने संकल्प लिया था कि जीवन मे कभी यह आचार न करूगाँ,परन्तु आप का आदेश सिर आँखो पर तो गुरू देव जोर से हँसने लगे और कहाँ मै तो परिक्षा ले रहा था,माता का आदेश है कि तुम दक्षिण मार्गी ही रहोगे।                

साधक सीताराम जी
                                                                                     साधक श्री विष्णुकान्त मुरिया जी


बहुत सारा वह यादे अभी भी भावविभोर कर देता हैं।उस समय स्वप्न मे श्री स्वामी दिखाई देते थे,परन्तु मैं नही जान पाता कि ये कौन है,लेकिन कभी कभी लगता था कि ये शिव है।काली की साधना और दिव्य दर्शन के बाद यह पता चला कि काली परम दयालु,करूणामयी है,तथा वे भक्त के भाव देखती है,वे परम प्रेममयी है।औघड़ गुरूजी के समाधि एक वर्ष पूर्व मुझे माँ ने वह रहस्य दिखा दिया।उसी समय श्री स्वामी ने दर्शन दिया और कुछ गोपनीय रहस्य से परिचित कराया।मुझे पता चला कि गुरू जी समाधि लेंगे और मुझे अब शिव श्री स्वामी के पास जाना है,उस समय मुझे पता चल गया था,कि जिन्हे मैं स्वप्न मे देखता रहा हूँ वो श्रीस्वामी श्री पिताम्बरा पीठ,दतिया के राष्टगुरू जो काशी विश्वनाथ जी के अवतार लेकर दतिया में बैठे है।जीवन में इतना रहस्य देखा हूँ कि अगर लिखूँ तो एक ग्रंथ बन जायेगा।शिव से शूरू करके साधना करते हुए अंत में स्वामी के चरणों मे अंतिम विश्राम तथा पुर्ण समर्पण अब स्वामी है,जैसा करे,अब वही शिव है वही माँ पीताम्बरा।काली माता ने श्री चरणों मै ला दिया।अब दतिया हमेशा आता रहा परन्तु अज्ञानता वश मेरी दीक्षा नही हो पा रही थी।श्री स्वामी अमृतेश्वर शिव के रूप मे विराजे है।श्री स्वामी ने कई बार मुझे कुछ रहस्य से परिचित कराया तथा कुछ ऐसा लीला रचे कि शारदीय नवरात्र में जाना पड़ा।वहाँ जाने पर पता चला कि कई साधक कई वर्षो से दीक्षा के लिए आए है,परन्तु दीक्षा नही मिलेगा ,कारण दीक्षा मे समय लगेगा,हो सकता है एकाध वर्ष,मैं तो घबड़ा गया और श्री स्वामी के अमृतेश्वर लिंग के पास जाकर कहा कि हे गुरूदेव आपने ही बुला लिया तो ये कैसी लीला है आपका तभी एक आदमी पिछे की ओर से कुछ बोला।मैं पिछे देखा कोई साधक थे ,बोले क्या कोई दिक्कत है मैंने कहा दीक्षा लेना था,उसपर वे बोले कि आप श्री विष्णुकान्त मुरिया जी से मिलिए,वही उपदेशक है,श्रीगुरू जी के प्रिय शिष्य तथा बहुत बड़े साधक के साथ दयालु है,और गुरू चरण पादुका के समक्ष गुरूकृपा से यही दीक्षा देते है।यहाँ जो होता है श्री स्वामी की इच्छा से होता है,और गुरूदेव ने बुलाया है तो दीक्षा अवश्य मिलेगा ऐसा मेरा विश्वास था।मै प्रथम बार श्री मुरिया जी के पास गया,एक दिव्य व्यक्तित्व रक्त परिधान मे एक गौरवर्ण को देख मैने कहा कि मुझे दीक्षा चाहिए तो मेरा नाम पूछा,और गम्भीर मुद्रा मे कहा मिल जायेगा आज ही,स्वयं उन्होने सारी प्रक्रिया पूर्ण करवा कर बोले कि तीन बजे दीक्षा के लिए आ जाए।मैं समय के पूर्व ही पधार गया ,नियत समय पर दीक्षा हुआ,वह क्षण लगा जैसे स्वामी चरण पादुका पर विराजमान मंद मंद मुस्कुरा रहे है,मै थोड़े पल के लिए चेतना शून्य हो गया।जप शूरू करने से पुरे नवरात्र कितने दिव्य अनुभव हुए जैसे जन्म जन्म की मुराद पूरी हुई हो।श्री विष्णुकान्त मुरिया जी परम साधक के साथ एक विशिष्ट ज्योतिष भी है,तथा इतने दयालु है की आज भी उनके मार्गदर्शन से आगे बढ रहा हूँ।हमेशा इन्होने मुझपर अपनी दया दृष्टि रख साधना के गोपनीय मर्म समझा कर मुझे आगे बढाते रहे है।मेरे इस लेख को पढने वाले को मै जरूर कहूँगा कि एक बार श्री पीताम्बरा पीठ जाकर श्री पीताम्बरा माई के साथ श्री स्वामी का दर्शन करे,तथा वहाँ श्री धूमावती माई,महाकाल भौरव,श्री बटुक भौरव,श्री गणेश जी,श्री हनुमान जी,हरिद्रा सरोवर के साथ श्री स्वामी मंदिरम् का दर्शन करे,वही अमृतेश्वर महादेव मे साक्षात श्री स्वामी जी महराज विराज रहे है।यहाँ पर प्राचीन वण्खण्डेश्वर शिव मंदिर भी साक्षात जाग्रत शिव है जो भीम के द्वारा प्रतीष्ठित है,यह अश्वथामा की साधना स्थली रही है साथ मे श्री परशुराम जी का दर्शन भी करे।श्री माँ त्रिपुर सुन्दरी का मंदिर भी है परन्तु वहाँ दर्शन करना संभव नही है।भारत का ऐसा दिव्य शक्ति पीठ जो आज कही ऐसा दिखाई नही देता,जाए तो श्री विष्णुकान्त मुरिया जी जैसे अलौकिक,साधक से मिल आपको आत्मिक शांति मिलेगा।मैने इनका विशाल हृद्वय देखा है,तथा ये कितने विलक्षण पूरूष है शायद मै समझ नही पाता हूँ,कोइ भी समस्या हो शीघ्र समाधान बता देते है।जब गुरू कृपा होती है,तो जीवन के परम सत्य दिखाई देने लगता है।यह गुरू कृपा ही है कि मै स्वामी चरण रज की धूली लगा पाया।नाना पंथ जगत के निज निज गुण गावै।सबका सार बता कर गुरू मारग लावै।मन ही बंधन है,आत्मा की बात करने से कुछ नही होगा,गुरू ही सब कर्ता है,जो जैसा पात्र होगा उस समय गुरू की कृपा मिल ही जाती है।यह स्थान झाँसी के पास है।जीवन मे जब कोई निशचल मन से साधना पर चल पड़े तो स्वामी कृपा करते ही है।

Sunday, May 1, 2011

मंत्र प्रयोग



गृह रक्षा- गाय का गोबर या लाल रंग का घोल लेकर उक्त मंत्र से १०८बार पढ़कर अभिमंत्रित कर लें फिर इसी मंत्र को पढ़ते हुए घर के चारों ओर रेखा खींच दें।ऐसा कर देने से घर में भूत,पिशाच,चोर डाकू के घुसने का भय नहीं रहता।साथ ही हिंसक जंतु,अग्नि भय से भी सुरक्षित रहा जा सकता हैं।
मंत्र- ॐ ह्रीं चण्डे!चामुण्डे भ्रुकुटि अट्टा ट्टे,भीम दर्शने!रक्ष रक्ष चौरेभ्यःवज्रेभ्यःअग्निभ्यःश्वापदेभ्यःदुष्टजनेभ्यःसर्वेभ्यःसर्वौपद्रवेभ्यःगण्डीःह्रीं ह्रीं ठःठः।


टोना टोटका तंत्र बाधा निवारण मंत्र- आज यह भी देखने को मिलता है कि कुछ दुष्ट लोग किसी टोना करने वाले से कोई प्रयोग करा देते है और लोग भयानक कष्ट भोगने लगते है।
दवा करने पर भी लाभ नहीं मिलता है,तब इस मंत्र को ११ माला से सिद्ध कर प्रयोग करे।लोग जादू टोना से प्रभावित होकर विक्षिप्त भी हो जाते है।किसी शुभ मूर्हूत मे ईस मंत्र का प्रयोग करें।एक दीपक जलाकर किशमिश का भोग लगा कर मंत्र सिद्ध करे,फिर प्रयोग करते समय ७बार मंत्र पढ़ फूंक मारकर उतारा कर दें।ऐसा ७बार कर देने पर सभी जादू टोना नष्ट हो जाता हैं।बाद मे एक सफेद भोजपत्र पर अष्टगंध की स्याही से अनार के कलम से मंत्र लिख ताँबा या चाँदी की ताबीज मे यंत्र भरकर काला धागा लगाकर स्त्री हो तो बांया पुरूष हो तो दांये बांह मे ७बार मंत्र पढ़ बाँध ले।
शाबर मंत्र- ॐ नमो आदेश गुरू को।ॐ अपर केश विकट भेष।खम्भ प्रति पहलाद राखे,पाताल राखे पाँव।देवी जड़घा राखे,कालिका मस्तक रखें।महादेव जी कोई या पिण्ड प्राण को छोड़े,छेड़े तो देवक्षणा भूत प्रेत डाकिनी,शाकिनी गण्ड ताप तिजारी जूड़ी एक पहरूँ साँझ को सवाँरा को कीया को कराया को,उल्टा वाहि के पिण्ड पर पड़े।इस पिण्ड की रक्षा श्री नृसिंह जी करे।शब्द साँचा,पिण्ड काचा।फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा।
गठिया रोग और वात वेदना-
गठिया या वात रोग से लोग बहुत प्रभावित होकर हमेशा दवा खाते रहते है,इस प्रयोग को करे,लाभ होगा।किसी पर्वकाल मे मंत्र को सिद्ध करे।बाद में सन्धि वात या गठिया,वात या कमर में बाई,वात बेदना वाले रोगी को मंगल या रवि को मोर पंख से २१ बार उक्त मंत्र पढ़कर झाड़े।११ माला जप कर मंत्र सिद्ध कर लें।
मंत्र- ॐ मूल नमःधुक्ष नमः।जाहि जाहि ध्वाक्ष तमःप्रर्कीण अड़्गा प्रस्तार प्रस्तार मु़ञ्च।

Monday, April 18, 2011

हनुमान जयंती पर विशेष.....

बजरंगबली कलियुग के एकमात्र ऐसे देवता है जो बस क्षण भर में अपने भक्तों के सारे कष्टों को हर लेते है,बस दिल से एक बार सच्ची आवाज लगाने की आवश्यक्ता है।हनुमत महिमा का गुणगान हमारे सांसारिक और पारलौकिक हर पीड़ा का निदान एक अद्भूत राम बाण सा है।मर्यादा पुरुषोतम श्रीराम के परम प्रिय श्री हनुमान सच में अलौकिक और स्नेह सुधा प्रदान करने वाले है।मेरी अनुभूति है,जब भी मैने अपने जीवन के सर्वाधिक कठिन पलों में बजरंगबली को आवाज लगाया है,वो बस पवनवेग से आये है और सारी मुसीबतों और कष्टों को उड़ाकर मेरी जिंदगी से कही दूर फेंक दिया है।सभी देवी,देवताओं के प्रिय हमारे हनुमान जी बस भावना के भूखे है।वे सभी बौद्धिक कलाओं से युक्त ज्योतिष और संगीत के महाज्ञाता है।इस कलियुग की भीषण त्रासदी में एकमात्र हनुमत मंत्र हर बाधाओं को दूर करने वाला है।सभी कार्यों को सिद्ध कर के हमें जीवन में एक प्रतिष्ठित स्थान दिलाने वाला है।
आज "हनुमान जयंती" के शुभ अवसर पर सर्वप्रथम मै सभी को बहुत सारी बधाईयाँ देना चाहता हूँ,तथा साथ ही आज की जाने वाली पूजा का संक्षिप्त विवरण भी दे रहा हूँ।

आज की पूजाः-
"यदि घर में पूजा स्थान हो,तो हनुमत प्रतिमा के समक्ष या सार्वजनिक मंदिर में जाकर चमेली के तेल का उपयोग कर इक्कीस,एकयावन या एक सौ आठ दीपों की दीपमाला भगवान के समक्ष अर्पण करे।बहुत ही उपयोगी और कारगर पद्धति है,ये मनवांछित फल बिन माँगे ही पा लेंगे..."


अभी कुछ दिनों से मेरे ब्लाग "ॐ शिव माँ" पर लगातार बहुत सी पोस्ट बस हनुमत महिमा और मंत्र प्रयोग पर छपती आयी है,मै उनका लिंक नीचे दे रहा हूँ।आप सब इस ज्ञानमयी आलेखों का श्रवन करे लाभ मिलेगा।

1.)॥ श्री बजरंग बाण ॥


2.)संकटमोचन हनुमानाष्टक


3.)श्री हनुमत महिमा


4.)श्री हनुमत शक्ति मंत्र प्रयोग

"हनुमान जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं"

Tuesday, April 5, 2011

॥ श्री बजरंग बाण ॥

श्री हनुमान जी का बजरंग बाण जो प्रचलित है,उसका प्रभाव तो है ही परन्तु यह बजरंग बाण तांत्रोक्त प्रभाव वाला है।सारे अशुभ ग्रह,शत्रु,अवरोध का शमन बजरंग बाण पाठ से होता है।भूत,पिशाच,तंत्र बाधा,डाईन,मूठ,मारण या आसुरी शक्तियों का कोप इस सारे संकट से हनुमान जी मुक्त करते है।बजरंग बाण का पाठ करते समय अपने दायें हनुमत मूर्ति या चित्र के सामने एक लाल वस्त्र आसन के लिए रख ले ।  बजरंग बाण के हनुमान जी महामृत्युजय के साथ पंचमुख,सप्तमुख,एकादशमुख रूप धारण करके अकाल मृत्यु से रक्षा तो करते ही है साथ ही यम,काल को दूर भगाकर प्राणों की रक्षा करते है।पाठ से पहले गुरु,गणेश का पूजन कर पाठ करना चाहिए साथ ही तुलसी बाबा के साथ सीताराम जी का ध्यान कर हनुमान जी का निम्न ध्यान कर पाठ करना चाहिए।
                                                       अब श्री बजरंग बाण का पाठ लिख रहा हुँ।कहा जाता है कि जब बजरंग बाण का पाठ किया जाता है,तो हनुमान जी पधार जाते है।आजीवका में बाधा हो, या कोइ भी संकट ,तंत्र,मंत्र,मूठ,या ग्रह दोष से,या भूत पिशाच,का प्रकोप इस सभी बाधा से हनुमान जी रक्षा करये है।आपको कोई रास्ता नहीं मिल रहा हो,तो एक दीपक जला कर  किशमिश,गुड़ का भोग लगाकर प्रथम गुरुदेव,तब श्री गणेश,कुलदेवता का पुजन कर,राम परिवार सहित तुलसीबाबा को प्रणाम कर श्री बजरंग बाण का एक या इच्छा अनुसार विषम संख्या में पाठ करे तो हनुमान जी सारे संकट दूर कर देंगे।गूगूल का आहुती देकर पाठ करे तो विशेष लाभ होगा।
           ध्यान -अतुलित बल धामं,हेमशैलाभ देहं,दनुज वन कृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
             सकल गुणनिधानं वानराणामधीशं,रघुपति प्रियभक्तं वातजातं नमामि॥
                                          
॥ श्री बजरंग बाण ॥
  ॥दोहा॥ 
निश्चय प्रेम प्रतिति ते,विनय करे सह मान,।तेहि के कारज सकल शुभ,सिद्ध करैं हनुमान॥
॥चौपाई॥
जय हनुमन्त!सन्त हितकारी।सुन लीजे प्रभु!विनय हमारी॥
जन के काज विलम्ब न कीजै।आतुर दौरि महा सुख दीजै॥
                                                       जैसे कूदि सिन्धु के पारा।सुरसा वदन पैठि विस्तारा॥
                                                       आगे जाय लंकिनी रोका।मारेहु लात गई सुर लोका॥
जाय विभीषण को सुख दीन्हा।सीता निरखि परम पद लीन्हा॥
बाग उजारि सिन्धु मँह बोरा।अति आतुर यम कातर तोरा॥
                            अक्षय कुमार मारि संहारा।लूम लपेट लंक को जारा॥
                       लाह समान लंक जरि गई।जै जै ध्वनि सुर पुर नभभई॥
अब विलम्ब केहि कारण स्वामी।कृपा करहु प्रभु!अन्तर्यामी॥
जय जय लखन प्राण के दाता।आतुर ह्वै दुख करहु निपाता॥
                  जै गिरधर!जै जै सुख सागर।सुर समूह समरथ भट नागर॥
                 ॐ हनु हनु हनु हनुमन्त हठीले।बैरिही मारु व्रज सम मिले॥
गदा बज्र लै बैरिहि मारौ।महा राज!निज दास उबारौ।
सुनि हँकार हुंकार दै धावौ।ब्रज गदा हनु! बिलम्ब न लावौ।
                 ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमन्त कपीसा।ॐ हुं हुं हुं हनु!अरि उर सीसा।
                       सत्य होहु हरि सपथ पाय कै।रामदूत!धरू मारू धाय कै।
 जय जय जय हनुमन्त अगाधा।दुख पावत जन केहि अपराधा।
 पूजा जप तप नेम अचारा।नहिं जानत कछु दास तुम्हारा।
                 वन उपवन जल थल गृह माहीं।तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं।
                      पाँव परौं कर जोरि मनावौं।अपने काज लागि गुण गावौं।
जै अंजनी कुमार!बलवन्ता।शंकर सुवन वीर हनुमन्ता।
वदन कराल!काल कुल घातक।राम सहाय!सदा प्रति पालक।
                      भूत प्रेत पिशाच निसाचर।अगिन बेताल काल मारी मर।
                     इन्हें मारु,तोहिं सपथ राम की।राखु नाथ मर्याद नाम की।
जनक सुता हरि दास कहावौ।ताकी सपथ विलम्ब न लावौ।
जय जय जय ध्वनि होत अकासा।सुमिरत होत दुसह दुख नासा।
चरन पकरि कर  जोरि मनावौं।एहि अवसर अब केहि गोहरावौं।
                      उठु उठु चलु तोहिं राम दोहाई।पाँय परौं कर जोरि मनाई।
ॐ चं चं चं चं चपल चलन्ता।ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमन्ता।
ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल।ॐ सं सं सहमि पराने खल दल।
                      अपने जन को तुरत उबारो।सुमिरत होत आंनद हमारो।
                      ताते बिनती करौं पुकारी।हरहु सकल दुख विपती हमारी।
परम प्रबल प्रभाव प्रभु तोरा।कस न हरहु अब संकट मोरा।
हे बजरंग!बाण सम धावौं।मेटि सकल दुख दरस दिखावौं।
                      हे कपि राज काज कब ऐहौ।अवसर चूकि अन्त पछतैहौ।
                     जन की लाज जात एहि बारा।धावहु हे कपि पवन कुमारा।
जयति जयति जय जय हनुमाना।जयति जयति गुन ज्ञान निधाना।
जयति जयति जय जय कपि राई।जयति जयति जय जय सुख दाई।
          जयति जयति जय राम पियारे।जयति जयति जय,सिया दुलारे।
      जयति जयति मुद मंगल दाता।जयति जयति त्रिभुवन विख्याता।
एहि प्रकार गावत गुण शेषा।पावत पार नहीं लव लेसा।
राम रूप सर्वत्र समाना।देखत रहत सदा हर्षाना।
               विधि सारदा सहित दिन राती।गावत कपि के गुन बहु भाँती।
               तुम सम नहीं जगत बलवाना।करि विचार देखउँ विधि नाना।
यह जिय जानि सरन हम आये।ताते विनय करौं मन लाये।
सुनि कपि आरत बचन हमारे।हरहु सकल दुख सोच हमारे।
                   एहि प्रकार विनती कपि केरी।जो जन करै,लहै सुख ढेरी।
                            याके पढ़त बीर हनुमाना।धावत बान तुल्य बलवाना।
मेटत आय दुख छिन माहीं।दै दर्शन रघुपति ढिंग जाहीं।
पाठ  करे बजरंग बाण की।हनुमत रक्षा करैं प्राण की।
                    डीठ मूठ टोनादिक नासैं।पर कृत यन्त्र मन्त्र नहिं त्रासै।
                             भैरवादि सुर करैं मिताई।आयसु मानि करैं सेवकाई।
प्रण करि पाठ करै मन लाई।अल्प मृत्यु ग्रह दोष नसाई।
आवृत ग्यारह प्रति दिन जापै।ताकी छाँह काल नहिं व्यापै।
                   दै गूगुल की धूप हमेशा।करै पाठ तन मिटै कलेशा।
                        यह बजरंग बाण जेहि मारै।ताहि कहौ,फिर कौन उबारै।
शत्रु समूह मिटै सब आपै।देखत ताहि सुरासुर काँपै।
तेज प्रताप बुद्धि अधिकाई।रहै सदा कपि राज सहाई।

॥दोहा॥
उर प्रतीति दृढ सरन हवै,पाठ करै धरि ध्यान।
बाधा सब हर करै,सब काज सफल हनुमान।
प्रेम प्रतीतिहि कपि भजे,सदा धरै उर ध्यान।
तेहि के कारज सकल सुभ,सिद्ध करैं हनुमान॥
…………….॥समाप्त॥……………..